इलाज की जगह मिली बेरुखी: ‘क्रॉनिक फटीग सिंड्रोम’ के मरीज झेल रहे हैं दोहरी मार, रिसर्च में खुलासा

नई दिल्ली। क्या आपने कभी ऐसी थकान महसूस की है जो आराम करने के बाद भी दूर न हो? ‘क्रॉनिक फटीग सिंड्रोम’ के मरीजों के लिए यह रोजमर्रा की कड़वी सच्चाई है। हालांकि, बीमारी के लक्षणों से भी बड़ा दर्द वह उपेक्षा है, जिसका सामना उन्हें हर दिन करना पड़ता है।

हाल ही में ‘पीएलओएस वन’ नामक पत्रिका में एक बेहद अहम अध्ययन प्रकाशित हुआ है। आयोवा स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने इस बीमारी से पीड़ित 505 ऐसे लोगों के मेमोरियल रिकॉर्ड्स का गहराई से विश्लेषण किया है, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं। इस अध्ययन से इन मरीजों के साथ होने वाली घोर अनदेखी की सच्चाई सामने आई है। आइए सबसे पहले यह समझते हैं कि आखिर यह बीमारी है क्या।

शरीर में दर्द और दिमाग में धुंधलापन
मायल्जिक एन्सेफेलोमाइलाइटिस या क्रोनिक फैटीग सिंड्रोम एक बेहद गंभीर और लंबे समय तक चलने वाली स्थिति है। इस बीमारी में, थोड़ी सी शारीरिक मेहनत के बाद ही मरीज को अत्यधिक थकावट होने लगती है और उसके लक्षण और भी ज्यादा बिगड़ जाते हैं। इसके साथ ही, मरीजों को अक्सर शरीर में दर्द, नींद से जुड़ी परेशानियां और अपनी सोचने-समझने की क्षमताओं में भी भारी गिरावट का सामना करना पड़ता है।

बीमारी से बड़ी व्यवस्था की बेरुखी
यह शोध ‘नेशनल क्रानिक फटीग एंड इम्यून डिसफंक्शन सिंड्रोम फाउंडेशन’ के एक स्मृति पृष्ठ पर उपलब्ध डेटा पर आधारित है। यहाँ उन 505 मरीजों के परिवारों और मित्रों द्वारा लिखे गए शब्द मौजूद थे। इन अभिलेखों का अध्ययन करने पर शोधकर्ताओं ने पाया कि इन मरीजों को स्वास्थ्य अधिकारियों और बीमा कंपनियों द्वारा बड़े पैमाने पर अनदेखा किया गया। इन संस्थागत विफलताओं के कारण मरीजों को न सिर्फ अपने इलाज में दिक्कतों का सामना करना पड़ा, बल्कि उन्हें सामाजिक अलगाव भी झेलना पड़ा।

मरीजों के परिजनों और दोस्तों के इन शब्दों का विश्लेषण करने पर मुख्य रूप से चार बड़ी सच्चाइयां या विषय उभर कर सामने आए:

-व्यवस्थागत उपेक्षा और संस्थागत विफलता: सिस्टम और जरूरी संस्थाओं द्वारा मदद न मिलना।
-नैदानिक उपेक्षा और विफलता: चिकित्सा और इलाज के स्तर पर होने वाली अनदेखी।
-सामाजिक अलगाव: समाज से पूरी तरह अलग-थलग पड़ जाना।
-व्यक्तिगत बोझ: मरीज के अपने कंधों पर पड़ने वाला शारीरिक और मानसिक भार।

शोधकर्ताओं की टीम ने यह डेटा इसलिए एकत्रित किया ताकि दुनिया भर में इस सिंड्रोम से पीड़ित लाखों मरीजों के जीवन की एक स्पष्ट झलक मिल सके। उन्हें पूरी उम्मीद है कि इस अध्ययन से एमई/सीएफएस के मरीजों के जीवन के संघर्षों, उनके अनुभवों और उनकी मृत्यु के कारणों को और अधिक गहराई से समझने में मदद मिलेगी।

Related Articles

Back to top button