एम्स सहित छह चिकित्सा संस्थान करेंगे स्वप्रतिरक्षित बीमारियों पर शोध, परिवारों में बीमारी फैलने के कारणों का होगा अध्ययन
देश में स्वप्रतिरक्षित बीमारियों के बढ़ते मामलों और उनके कारणों को समझने के लिए चिकित्सा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण शोध की तैयारी की जा रही है। दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) सहित छह प्रमुख चिकित्सा संस्थान इस अध्ययन में शामिल होंगे। शोध का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि कुछ परिवारों में स्वप्रतिरक्षित बीमारियां एक से अधिक सदस्यों को क्यों प्रभावित करती हैं। इसके साथ ही बीमारी के आनुवंशिक और पर्यावरण से जुड़े कारणों की भी पहचान करने का प्रयास किया जाएगा।
स्वप्रतिरक्षित बीमारियां ऐसी स्थितियां होती हैं, जिनमें शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता गलती से अपने ही स्वस्थ ऊतकों और अंगों पर हमला करने लगती है। सामान्य परिस्थितियों में रोग प्रतिरोधक प्रणाली शरीर को संक्रमण और बाहरी खतरों से बचाती है, लेकिन इन बीमारियों में इसकी कार्यप्रणाली प्रभावित हो जाती है। इसके कारण शरीर के अलग-अलग अंगों में सूजन और अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
इस श्रेणी में रूमेटाइड गठिया, ल्यूपस, टाइप-1 मधुमेह और थायरॉइड से जुड़ी कुछ बीमारियां शामिल हैं। कई मामलों में परिवार के अन्य सदस्यों में भी ऐसी बीमारियां देखने को मिलती हैं। हालांकि, केवल आनुवंशिक कारण ही इसके लिए जिम्मेदार नहीं होते। पर्यावरण, संक्रमण और जीवनशैली से जुड़े कारक भी बीमारी के खतरे को प्रभावित कर सकते हैं।
एम्स सहित छह चिकित्सा संस्थानों का यह अध्ययन बीमारी के पारिवारिक संबंधों को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। शोध के माध्यम से यह जानने का प्रयास किया जाएगा कि किन परिस्थितियों में परिवार के सदस्यों में बीमारी विकसित होने की आशंका अधिक रहती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के शोध से भविष्य में बीमारी की समय रहते पहचान, बेहतर जांच और उपचार की रणनीति तैयार करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, अध्ययन के निष्कर्ष सामने आने के बाद ही इसके वास्तविक परिणामों का आकलन किया जा सकेगा।




