आदिवासियों ने धान छोड़कर पहली बार की तरबूज, खरबूज की खेती, लहलहाई फसल, इतना होगा मुनाफा
जांजगीर-चांपा जिले से बदलाव की तस्वीर सामने आई है. यहां पहली बार आदिवासी किसानों ने परंपरागत धान की खेती से आगे बढ़कर तरबूज की खेती शुरू की है. महानदी और शिवनाथ नदी के किनारे की उपजाऊ बालूई मिट्टी और अनुकूल जलवायु का लाभ उठाते हुए किसान अब फसल विविधीकरण की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं.

पामगढ़ ब्लॉक के खोरसी, धाराशिव, तनौद और कमरीद गांवों में इस वर्ष करीब 12 एकड़ क्षेत्र में तरबूज की खेती की गई है. खास बात ये कि इस पहल में आदिवासी किसानों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया है. अब उनके खेतों में लहलहाती फसल अच्छी पैदावार का संकेत दे रही है. पहले जहां किसान सिर्फ धान की खेती पर निर्भर थे, वहीं अब वे नई फसलों को अपनाकर अपनी आय बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.
प्रति एकड़ 14 से 15 टन तक उत्पादन संभव
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, उन्नत किस्म के बीज और वैज्ञानिक पद्धति से की गई खेती के कारण तरबूज की मांग बाजार में अच्छी है, अनुमान लगाया जा रहा है कि इस बार प्रति एकड़ 14 से 15 टन तक उत्पादन हो सकता है, जिससे किसानों को लागत निकालने के बाद 60 से 80 हजार रुपए तक का मुनाफा मिलने की संभावना है. कृषि विज्ञान केंद्र और उद्यानिकी विभाग द्वारा किसानों को लगातार प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन और विपणन की सुविधा दी जा रही है, वहीं स्वयं सहायता समूह की महिलाएं साप्ताहिक बाजारों में तरबूज की बिक्री कर रही हैं, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल रही है.




