कलाकारों का महासंगम है-कोणार्क महोत्सव

शशिप्रभा तिवारी
समुद्र का विस्तृत तटीय बालूका राशि, उसके एक छोर पर कोणार्क का सूर्य मंदिर और उसकी पृष्ठभूमि पर सुसज्जित कोणार्क महोत्सव का मुक्ताकाशी मंच स्थित है। जहां दिसंबर महीने में कलाकारों और दर्शकों का मेला लगा रहता है। शुक्ल पक्ष की चांदनी रात, हल्की गुनगुनाती सर्द रात और हर शाम दो भारतीय शास्त्रीय शैली में सामूहिक नृत्य प्रदर्शन का साक्षी होना, अपने आप मन को एक अनोखे अनुभव से परिपूरित कर देता है। यह रसानुभूति सहज प्राप्य है, जो इस महोत्सव के साक्षी बनते हैं।
कोणार्क महोत्सव की पहली संध्या में नृत्य उपासना पीठ की प्रस्तुति हुई। इसमें ओडिसी नृत्य सोनाली महापात्र और साथी कलाकारों ने पेश किया। उनकी शुरूआत आदिदेव सूर्य की वंदना से हुई। उनकी दूसरी प्रस्तुति श्री हनुमान चालीसा पर आधारित नृत्य प्रस्तुति थी। गोस्वामी तुलसीदास की अमर रचना पर आधारित प्र्र्रस्तुति राग मालिका और ताल मालिका में पिरोई गई थी। उत्तर प्रदेश की धरती पर रची गई, इस रचना को ओडिसा के कलाकारों द्वाना आडिसी नृत्य शैली में प्रस्तुत करना, एक नवाचार माना जा सकता है। यही परंपरा को जीवित रखने का एक प्रमाण भी पेश करता है, जिसमें कलाकार आपस में लेन देन करते हैं, तो एक प्रवाह बना रहता है। उनकी अगली पेशकश पल्लवी थी। यह राग सारंग और एक ताली में निबद्ध था।
ओडिसी नृत्यांगना सोनाली मिश्रा की अगली प्रस्तुति चार युग देवी थी। यह राग भीमपलासी और झंपा ताल में निबद्ध थी। इसमें अलग अलग युग में देवी के विभिन्न रूपों की उपासना को दर्शाया गया। सतयुग में देवी दुर्गा, त्रेता में पद्मलोचना, द्वापर में राधा कृष्ण और कलियुग में देवी के विविध शक्तिपीठ उपासना के केंद्र हैं।
पहली संध्या की दूसरी प्रस्तुति भरतनाट्यम नृत्य शंकरानंद कलाक्षेत्र अन्सेंबल की थी। इसमें
नृत्यांगना आनंदा शंकर और साथी कलाकार शामिल थे। उन्होंने सत्रहवीं शताब्दी के तेलुगू भक्त रामदास की रचना पर आधारित ‘दशावतार‘ से नृत्य आरंभ किया। दूसरी प्रस्तुति ‘देवी उपासकम‘ थी। यह रचना ‘श्री विद्याशिव वामभाग निलयम‘ पर आधारित नृत्य में देवी के नीलाक्षी, गौरी, ललिता, चामुंडेश्वरी, जगमोहिनी, महाकाल रूपों को दर्शाया। नृत्यांगनाओं ने कुंडलिनी जागरण और सहस्रार चक्र के जागरण को बीजमंत्र व ‘ए गिरि नंदिनी‘ के जरिए मोहक अंदाज में दर्शाया। उनकी अंतिम पेशकश ‘शिव हर‘ थी। चिदंबरम स्वामी को निवेदित यह प्रस्तुति ‘कनक सभागते कांचन विग्रह‘, ‘भो शंभो स्वयंभो‘, ‘शिव तांडव स्त्रोत‘ पर आधारित थी। इसमें डमरू की ध्वनि को हस्तकों से दर्शाना बहुत मोहक प्रतीत हुआ।
कोणार्क महोत्सव की दूसरी संध्या में कुचिपुडी नृत्यांगना वैजंती काशी और उनके दल ने शिरकत किया। शांभवी स्कूल ऑफ डांस के कलाकारों ने नृत्य रचना ‘क्षीर सागर मंथन‘ पेश किया। यह डॉ शतवधानी आर गणेश और डी वी शास्त्री की परिकल्पना थी। ‘गणेश स्तुति‘, श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक, ‘नारायण नमो भवो‘, ‘नीलकंठाय दिव्याय नित्याय‘, ‘मोहिनी नवर रस मोह‘, ‘विश्वम मोहिनी विश्व अरकिंड‘ आदि रचनाओं के माध्यम से सामूहिक, एकल और युगल नृत्य के जरिए नृत्य को पिरोया गया। इस प्रस्तुति में पर्वत को दर्शान के लिए प्रॉप्स का प्रयोग किया गया, जो थोड़ा अनावश्यक सा प्रतीत हो रहा था।
इस संध्या की दूसरी पेशकश ओडिसी विजन एंड मूवमेंट सेंटर की ओडिसी नृत्य थी। इस अंश मंे वरिष्ठ ओडिसी नृत्यांगना शर्मिला विश्वास की नृत्य रचना को नृत्यांगना व नर्तकों के दल ने पेश किया। उनकी पहली प्रस्तुति महालक्ष्मी स्त्रोतम थी। यह रचना ‘नमस्ते गरूड़ आरूढ़े‘ पर आधारित थी। देवी के शंख, चक्र, पद्म, गदा को धारण किए हुए रूप को दर्शाया गया। इस दल ने ‘आवर्तन विवर्तन‘ में साधारण से असाधारण की यात्रा को ताल, लय और छंद के माध्यम से दर्शाया। ‘सृष्टि तत्व‘ जीवन का विकास दिखाया। पुराण से जयदेव के गीत गोविंद के अंश को शामिल किया गया। पारंपरिक अंदाज से हटकर शर्मिला विश्वास ने नवीन कलेवर में इसे पेश किया। संगीत और नृत्य के साथ शरीर, अंगों, प्रत्यंगों, पांव और हस्तकों की गतियों का प्रयोग सरस और लयात्मक था। कुल मिलाकर परंपरा के साथ नवीनता का यह पटाक्षेप सराहनीय था।
सृजन अन्सेंबल के कलाकारों ने तीसरी संध्या में ओडिसी नृत्य प्रस्तुत किया। गुरु रतीकांत महापात्र और सृजन के कलाकारों ने ओडिसी नृत्य पेश किया। उन्होंने आदि शंकराचार्य की रचना पर आधारित ‘अर्धनारीश्वर‘, ‘युग्म द्वंद्व पल्लवी‘, ‘अभिनय‘-नाचंति रंगे श्री हरि कुंजबिहार‘, ‘वंदे सूर्यम‘ पेश किया। अर्धनारीश्वर राग मालिका और ताल मालिका में निबद्ध था। पल्लवी राग बागेश्वरी और एक ताली में निबद्ध था। अभिनय राग आरभि और एक ताली में निबद्ध था। वंदे सूर्यम राग जोगिया और आदि ताल में निबद्ध था। इस समूह की सभी प्रस्तुतियों आपसी संयोजन और संतुलन प्रभावकारी और आकर्षक था। गुरु केलुचरण की नृत्य रचनाओं को इस तरह से संरक्षित का अनूठा प्रयास गुरु रतीकांत कर रहे हैं, यह महत्वपूर्ण है।
कथकली नृत्य शैली मेें दुर्योधन वध को केरल कलामंडलम के कलाकारों ने पेश किया। इस प्रस्तुति में दुर्योधन, दुशासन, युद्धिष्ठिर, शकुनि, द्रौपदी और कृष्ण के पात्रों के माध्यम से महाभारत के इस प्रसंग को बड़े ही मार्मिक अंदाज में कलामंडलम के कलाकारों ने पेश किया। रचना ‘पंकज लोचन पादम् शरणम्‘, ‘कृष्ण हरेवल्लभ पंचप्राणम्‘, ‘वेणी वाणी द्रौपदी पिरोया गया।
मणिपुरी नर्तनालय के कलाकारों के दल में मणिपुरी नृत्यांगना बिंबा देवी और उनके साथी शामिल थे। उन्होंने लीलाकमल गोपस्थल लीला पेश किया। यह गुरु बिपिन सिंही की नृत्य परिकल्पना थी। ‘भजेक मंडनम्‘ के श्लोकों से नृत्य आरंभ हुआ। मणिपुरी नृत्य शैली में कार्तिक या शरद पूर्णिमा को रास नृत्य करने की परंपरा है। उस नजरिए से देखा जाए, तो उस रोज भी पूर्णिमा की रात थी। आसमान में पूरा चांद अपनी सोलह कलाओं से दमक रहा था, शायद इसलिए भी यह नृत्य ज्यादा जानदार प्रतीत हुआ। रचना ‘संपन्न श्रीकृष्ण करूणामय‘, ‘राधे राधे कृष्णश्याम‘, ‘रून झुन नुपुर धुनि‘, ‘हरिहराय यादवाय नमो नमः‘ के माध्यम से श्रीकृष्ण की बाल लीला, माखनचोरी, कंदुक क्रीड़ा, पंुग चोलम और कृष्ण के विभिन्न रूपों को दर्शाना सरस था। नृत्य परिकल्पना लासानी थी।
अगली प्रस्तुति ओडिसी नृत्य शैली में गुरु भरतचंद गिरि की शिष्याओं की थी। उनकी देवप्रसाद दस शैली में चारूकेशी पल्लवी पहली पेशकश थी। दूसरी प्रस्तुति नृत्य नाटिका गजानन थी। भरत नृत्य मंदिर की प्रस्तुति औसत स्तर की थी।
महोत्सव की अंतिम संध्या में उत्कल डांस एंड रीसर्च अकादमी के कलाकारों ने ओडिसी नृत्य पेश किया गया। इस अकादमी की शुरूआत गुरु सहदेव पाढ़ी ने किया था। इनदिनों आरती कार इस अकादमी का संचालन कर रही हैं। उनकी प्रस्तुति में गंगा की कथा ‘त्रिपथगा‘ और ‘नियति‘ शामिल की गई। ‘त्रिपथगा‘ रचना ‘देवी सुरेश्वरी भगवती गंगे‘ पर आधारित थी। जबकि ‘नियति‘ में राम वन गमन प्रसंग, महाभारत युद्ध प्र्रसंग को दर्शाया गया। इस अंश में कृष्ण केे रूपों का विवेचन रचना ‘गोपी गोपाल साथे राधा रानी‘ में बहुत सुंदरता से किया गया।
कथक नृत्यांगना संयुक्ता सिन्हा डांस कंपनी के कलाकारों ने कथक नृत्य पेश किया। संयुक्ता ने प्रस्तुति का आरंभ आदि अनंत से किया। इसमें उनके साथ कथक नर्तक अफसर मुल्ला और संजीत गंगानी थे। उन्होंने कथक की टुकड़े, तिहाइयां, परण, आमद पेश किया। ये तीनों ही पारंगत कलाकारों की श्रेणी में हैं। लेकिन, इतने बड़े उत्सव में मंच की गरिमा का थोड़ा भी ध्यान नहीं रखा गया। एक तो उनका मंच पर बैठकर हंसना और दूसरा एक प्रस्तुति के बाद आठ-दस मिनट का अंतराल उनकी प्रस्तुति को बहुत ही अनौपचारिक बना दिया। अगले अंश में उनकी शिष्याओं ने नृत्य पेश किया। इसे रचनाओं ‘भस्म भूषण अंग शिव‘, ‘लीला सांवरे को नयन विशाल‘, ‘श्याम मयी भई राधिका‘ को कथक नृत्य शैली में पिरोई गई। कथक नृत्यांगना संयुक्ता सिन्हा से दर्शकों का काफी उम्मीदें थीं, लेकिन वह अपनी क्षमता के अनुरूप प्रदर्शन करने में असफल नजर आईं। क्योंकि ललित कला में मंच एक तरह से परीक्षा और चुनौती का अवसर होता है।
कोणार्क महोत्सव के दौरान एक ओर नृत्य प्रस्तुत किया जाता है वहीं दूसरी ओर चंद्रभागा समुद्र तट पर कलाकार रेत से कलाकृतियों का सृजन करते हैं। यह कोणार्क सैंड आर्ट फेस्टीवल के तौर पर प्रसिद्ध है। इस वर्ष इस आयोजन के विजेताओं में शामिल थे-पंचानन मंडल, आर सैमुअल सेल्वा, वल्लूवन डी, गुबंेधीरन, प्रीति घोष, सरस्वती, निबेदिता, दीप्तीमयी, बससनी ओझा, संतोष कुमार नायक, प्रमोद बिस्वाल, महेश्वर साहू और राकेश सन्ना।




