दिल्ली में जर्जर इमारतों का मुद्दा फिर चर्चा में

दिल्ली में जर्जर और असुरक्षित इमारतों का मुद्दा एक बार फिर गंभीर बहस के केंद्र में आ गया है। दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में बहुमंजिला इमारत गिरने की घटना ने राजधानी में भवन सुरक्षा व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे के बाद आसपास की इमारतों की मजबूती, अवैध निर्माण और सुरक्षा मानकों के पालन को लेकर प्रशासन ने जांच और कार्रवाई तेज कर दी है।

सत्य निकेतन में गिरने वाली इमारत का इस्तेमाल छात्रों के रहने के लिए छात्रावास के रूप में किया जा रहा था। हादसे के बाद सामने आई जानकारी में भवन में अतिरिक्त निर्माण, तहखाने में मरम्मत कार्य और आपातकालीन निकास जैसी जरूरी व्यवस्थाओं की कमी को लेकर सवाल उठे हैं। अधिकारियों की जांच में यह भी देखा जा रहा है कि निर्माण नियमों का पालन हुआ था या नहीं और इमारत की संरचनात्मक स्थिति की समय पर जांच की गई थी या नहीं।

घटना के बाद दिल्ली नगर निगम ने भी सख्त कदम उठाने शुरू किए हैं। निगम ने चार मंजिल से अधिक की अवैध इमारतों को सील करने के निर्देश दिए हैं। इसके अलावा हादसे के आसपास मौजूद असुरक्षित इमारतों की जांच की जा रही है। प्रशासन का उद्देश्य ऐसी इमारतों की पहचान करना है जो भविष्य में लोगों की जान के लिए खतरा बन सकती हैं।

सत्य निकेतन जैसे घनी आबादी वाले इलाकों में बड़ी संख्या में विद्यार्थी और अन्य लोग किराये के कमरों तथा छात्रावासों में रहते हैं। ऐसे स्थानों पर भवन की मजबूती के साथ-साथ आग से सुरक्षा, आपातकालीन निकास, बिजली व्यवस्था और पर्याप्त रास्तों का होना बेहद जरूरी है। हादसे के बाद इन सभी व्यवस्थाओं की निगरानी को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2010 से 2026 के बीच दिल्ली में जर्जर इमारतों से जुड़े हादसों में करीब 110 लोगों की जान जाने की बात सामने आई है। इससे साफ है कि समस्या केवल एक इलाके या एक इमारत तक सीमित नहीं है।

अब जरूरत इस बात की है कि केवल हादसे के बाद कार्रवाई करने के बजाय दिल्ली की पुरानी और कमजोर इमारतों का नियमित सर्वेक्षण किया जाए। खतरनाक भवनों को समय रहते खाली कराया जाए और अवैध निर्माण के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई हो। सत्य निकेतन की घटना ने एक बार फिर यह सवाल सामने रखा है कि राजधानी में विकास के साथ नागरिकों की सुरक्षा को कितनी प्राथमिकता दी जा रही है।

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