Editorial: न्याय की आस में पचास साल से सलमान रुश्दी

Salman Rushdie has been waiting for justice for fifty years

लेखक सलमान रुश्दी की दिल्ली के पॉश एरिया फ्लैग स्टाफ रोड में पैतृक संपत्ति का कोर्ट में बीती आधी सदी से चल रहा कानूनी विवाद इस बात की चीख-चीख कर पुष्टि करता है कि हमारे यहां कोर्ट के रास्ते से न्याय पाना कितनी कठिन और थकाने वाली प्रक्रिया है। दरअसल रुश्दी के पिता अनीस अहमद रुश्दी ने पूर्व कांग्रेस नेता और सांसद भीखू राम जैन से 1970 में 3.75 लाख रुपये में संपत्ति बेचने का समझौता किया था।  जैन ने रुश्दी को कुछ बयाना भी दे दिया था। पर रुश्दी सौदे से मुकर गए और इसके बाद से यह केस निचली अदालतों से देश की सर्वोच्य अदालत में झूल रहा है। भारत में अदालती मामलों में फैसला आने में देरी की वजह सभी स्तरों के न्यायालयों द्वारा पीड़ित व्यक्ति या संगठन को न्याय प्रदान करने में होने वाली है। आप जानते हैं कि देश में न्यायपालिका तीन स्तरों पर काम करती है – सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय, और जिला न्यायालय। अदालती मामलों को दो प्रकारों में बांटा गया है – सिविल और क्रिमिनल। 2022 में पूरे भारत में लंबित रहने वाली सभी कोर्ट केस की संख्या बढ़कर 5 करोड़ हो गई थी, जिसमें जिला और उच्च न्यायालयों में 30 से भी अधिक वर्षों से लंबित 169,000 मामले शामिल हैं। दिसंबर 2022 तक 5 करोड़ मामलों में से 4.3 करोड़ यानी 85% से अधिक मामले सिर्फ जिला न्यायालयों में लंबित हैं। सरकार स्वयं सबसे बड़ी वादी है, जहां 50 प्रतिशत लंबित मामले सिर्फ राज्यों द्वारा दायर हैं। सरकार और कानून की दुनिया के सभी पक्षों को इस बारे में सोचना होगा किभारत में दुनिया के सबसे अधिक अदालती मामले  क्यों लंबित हैं? 2018 के नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, हमारी अदालतों में मामलों को तत्कालीन दर पर निपटाने में 324 साल से अधिक समय लगेगा। उस समय 2018 में 2.9 करोड़ मामले कोर्ट में लंबित थे। अदालतों में देरी होने से पीड़ित और आरोपी दोनों को न्याय दिलाने में देरी होती है। अप्रैल 2022 में बिहार राज्य की एक अदालत ने 28 साल जेल में बिताने के बाद, सबूतों के अभाव में, हत्या के एक आरोपी को बरी कर दिया। उसे 28 साल की उम्र में गिरफ्तार किया गया था, 58 साल की उम्र में रिहा किया गया। भारत में 2022 में जजों की स्वीकृत संख्या प्रति दस लाख आबादी पर 21.03 की थी। जजों की कुल स्वीकृत संख्या सर्वोच्च न्यायालय में 34, उच्च न्यायालयों में 1108, और जिला अदालतों में 24,631 थी। भारत के विधि आयोग और न्यायमूर्ति वी एस मलीमथ की समिति ने जजों की संख्या प्रति दस लाख आबादी पर 50 तक बढ़ाने की सिफारिश की थी। जजों की स्वीकृत संख्या निर्धारित होने के बावजूद, भारत की अदालतों ने जजों की रिक्ति के कारण काफी समय से पूरी क्षमता में काम नहीं किया है। 2022 में भारत में जजों की असल संख्या प्रति दस लाख आबादी पर 14.4 की थी। यह संख्या 2016 में 13.2 की थी और तब से इसमें बहुत मामूली बदलाव हुआ है। इसकी तुलना में, जजों की संख्या यूरोप में प्रति दस लाख आबादी पर 210 है, और अमेरिका में 150 हैं। गैर-न्यायिक कर्मचारियों के पद भी रिक्त हैं, कुछ राज्यों में 2018-19 में 25% तक रिक्तियां थी। सरकार ने कुछ समय पहले राज्यसभा में एक प्रश्न के उत्तर में बताया था कि कई अदालतों में लंबित मामलों की संख्या कुछ महीनों में 5 करोड़ के आंकड़े तक पहुंच सकती है। लंबित मामलों के मुद्दे पर चिंता जताते हुए सरकार ने कहा था कि ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में कमी आ सकती है, लेकिन असली चुनौती निचली अदालतों में है। एक बात समझ लें कि लंबित मामलों की बढ़ती संख्या से सुप्रीम कोर्ट भी परेशान है। उसका मानना कहा है कि लंबित मामलों को निपटाने और सुनवाई टालने के तरीकों पर अंकुश लगाने के लिए सक्रिय कदम उठाए जाने की तत्काल जरूरत है। न्यायमूर्ति एस. रवींद्र भट  और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की पीठ ने पिछले माह दिए अपने एकआदेश में जिला और तालुका स्तर की सभी अदालतों को समन की तामील कराने, लिखित बयान दाखिल करने, दलीलों को पूरा करने, याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार या इनकार करने की रिकॉर्डिंग और मामलों के त्वरित निपटारे आदि के निर्देश दिए।पीठ ने पांच साल से अधिक समय से लंबित पुराने मामलों की लगातार निगरानी के लिए संबंधित राज्यों के मुख्य न्यायाधीशों की ओर से समितियों के गठन का भी निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि लोग न्याय की आस में अपने वाद दायर करते हैं, इसलिए सभी हितधारकों को यह सुनिश्चित करने की बड़ी जिम्मेदारी है कि न्याय मिलने में देरी के कारण इस प्रणाली में लोगों का विश्वास कम न हो। बेशक, भारत की विधि व्यवस्था पर सवाल खड़ी करती है न्याय मिलने में होने वाली अभूतपूर्व देरी। इस तरफ तत्काल  कदम उठाने की जरूरत है। जरा सोचिए कि जब सलमान रुश्दी जैसी अंतरराष्ट्रीय शख्सियत को न्याय के लिए इतना जूझना पड़ रहा है, तो   आम इँसान की कोर्ट में क्या हालत होती होगी। हमारे यहां कहा ही जाता है कि किसी को दुख देना है तो उसे किसी कानूनी केस में फंसा दो या फिर पुरानी यानी सेकिंड हैंड कार दिलवा दो। आप देश के किसी भी भाग में निचली अदालतों से लेकर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जाकर देख लें। वहां पर आपको इंसाफ के लिए जूझते बेबस लोग मिलेंगे। किसी को कुछ नहीं पता होता कि उनके केस का फैसला कब आएगा। अब इस समस्या को और लटकाना नहीं चाहिए। इसका तत्काल हल खोजना जरूरी है।  देश के आम जन का देश की न्याय व्यवस्था पर भरोसा बना रहना चाहिए।

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