Delhi: भारत की अपनी शोध प्रविधि होनी चाहिए : प्रो. अरोड़ा

India should have its own research methodology: Prof. Arora

भारत की अपनी ज्ञान संपदा की विराट परंपरा है। उस ज्ञान परंपरा के शोध के लिए कैसे पश्चिमी शोध के मानकों को स्वीकार किया जा सकता है। हमारी अपनी अनुसंधान दृष्टि पहले से ही विकसित रही है। आधुनिक समय में भी यदि हमें मौलिक चिंतन की ओर अग्रसर होना है तो अपनी शोध प्रविधि का निर्माण करना होगा।‘ ये विचार ‘वैश्विक हिन्दी परिवार’ द्वारा विश्व हिन्दी सचिवालय, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद और केंद्रीय हिन्दी संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में ‘विश्व में हिन्दी शोध की चुनौतियों और नई दिशाओं की महत्ता’ विषय पर आयोजित व्याख्यानमाला के अंतर्गत दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. हरीश अरोड़ा ने कहे। उन्होंने कहा कि आज के तकनीकी युग में विषय का ठीक से चयन करने के पश्चात शोध लेखन में संकेन्द्रण और नए मानकों पर खरा उतरना आवश्यक है। शोध के लिए भारतीय जीवन दृष्टि और व्यावहारिकता के साथ परंपरा और आधुनिकता में समन्वय होना चाहिए। उन्होंने पुस्तकालय और पुस्तक पठन के साथ गहन चिंतन, मनन और गठन के पश्चात चरणबद्धता के साथ सार तत्व के लेखन पर बल दिया।

इस अवसर पर व्याख्यानमाला की अध्यक्षता कर रहे अध्यक्षता करते हुए गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय, गांधीनगर के पूर्व प्रोफेसर डॉ॰ आलोक गुप्त ने इक्कीसवीं सदी में महाशक्ति के रूप में उभरते भारत की भाषा हिन्दी के शोध की दिशा में नए आयाम बताए। उन्होने कहा कि तुलनात्मक दृष्टि से हिन्दी में शोध सर्वाधिक हो रहा है किन्तु इसका स्तर कायम रखना निहायत जरूरी है। कैरियर और कंपीटीशन शोध कार्य में बाधक नहीं होने चाहिए। उन्होंने कहा कि शोध निर्देशक और शोधार्थी को ‘रिल रेसट की तरह अपनी ज़िम्मेदारी और मर्यादा में रहना चाहिए। हिंदीतर भाषी शोधार्थी शोध सामग्री अपनी भाषा में पढ़कर तुलनात्मक शोध बेहतर कर सकते हैं। उनकी दृष्टि में शोधार्थी को आत्मावलोकन, गौरव और स्वाभिमान से आगे बढ़ाना चाहिए।

कार्यक्रम में विशिष्ट वक्ता के रूप में उपस्थित महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक के प्रो॰ राम नरेश मिश्र ने कहा कि शोध की गंभीरता हर हाल में कायम रहनी चाहिए। सुनिश्चित विषय चयन के अनुरूप ही रूपरेखा सुगठित की जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि क्षतिपूरक दीर्घीकरण और भाषा विज्ञान तथा व्याकरण के सिद्धांतों सहित मानकता व तार्किकता का अवश्य पालन होना चाहिए। लेखन में महाप्राण के संकट में होने पर अल्पप्राण छोटे भाई की तरह सहायता करता है। अच्छा मनुष्य हर जगह अच्छा ही रहता है। हमें भारतीय संस्कृति की प्रक्रिया अपनानी चाहिए।‘

इस अवसर पर भारत तथा विदेशों से जुड़े अनेक शोधार्थियों ने शोध की प्रविधि और प्रक्रिया से संबंधी अनेक प्रश्न पूछे। कार्यक्रम का विषय प्रवर्तन तथा स्वागत वक्तव्य श्री जितेंद्र कुमार ने दिया। कार्यक्रम का संचालन तथा विषय की भूमिका दिल्ली विश्वविद्यालय के रामलाल आनंद कालेज के प्राध्यापक डॉ राजेश गौतम  द्वारा रखी गई।  कार्यक्रम में जापान से पद्मश्री प्रो॰ तोमियो मिजोकामी, अमेरिका से प्रो॰ सुरेन्द्र गंभीर , यू॰ के॰ की साहित्यकार सुश्री दिव्या माथुर, शैल अग्रवाल, चीन से प्रो विवेक मणि त्रिपाठी, सिंगापुर से प्रो॰ संध्या सिंह, कनाडा से शैलेजा सक्सेना , खाड़ी देश से आरती लोकेश, थाइलैंड से प्रो॰ शिखा रस्तोगी तथा भारत से डॉ नारायण कुमार, प्रो॰ जगन्नाथन, डॉ जवाहर कर्नावट, प्रो राजेश कुमार, प्रो विजय मिश्र, गंगाधर वानोडे, विजय नगरकर , परमानंद त्रिपाठी, के एन पाण्डेय, सत्य प्रकाश, सोनू कुमार, अंजलि, वंदना, कविता, सरोज कौशिक,ए के साहू, ऋषि कुमार, माधुरी क्षीरसागर,परशुराम मालगे, डॉ॰विजय, विनय शील चतुर्वेदी, स्वयंवदा एवं अनुज आदि सुधी श्रोताओं की गरिमामयी उपस्थिति रही। तकनीकी सहयोग का दायित्व डॉ मोहन बहुगुणा और श्री कृष्ण कुमार द्वारा बखूबी संभाला गया।

यह कार्यक्रम वैश्विक हिन्दी परिवार के अध्यक्ष श्री अनिल जोशी के मार्गदर्शन और सुयोग्य समन्वय में संचालित हुआ। कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन जितेंद्र कुमार चौधरी  द्वारा किया। इस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण यूट्यूब तथा फेसबुक पर किया गया।

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