Education: डीयू के पंजाबी विभाग द्वारा “पंजाबी, हिंदी एवं अंग्रेज़ी भाषा, साहित्य और संस्कृति में शोध विधि” पर एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित

One day National Seminar on “Research Methods in Punjabi, Hindi and English Language, Literature and Culture” organized by Punjabi Department of DU.

दिल्ली विश्वविद्यालय के पंजाबी विभाग द्वारा पंजाबी, हिंदी और अंग्रेजी भाषा के साहित्य और संस्कृति में अनुसंधान पद्धति पर एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन गुरुवार को किया गया। सेमिनार के पहले सत्र के दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय संस्कृति परिषद के चेयरपर्सन एवं पीआरओ अनूप लाठर मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। सेमिनार का मुख्य भाषण प्रोफेसर राणा नायर (पूर्व प्रोफेसर, अंग्रेजी विभाग, पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़) द्वारा पढ़ा गया। इस दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के अध्यक्ष प्रो. अनिल अनेजा विशिष्ट अतिथि रहे जबकि सेमिनार की अध्यक्षता गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के पूर्व कुलपति प्रो. सतिंदर सिंह ने की। मुख्य अतिथि अनूप लाठर ने कार्यक्रम में संबोधित करते हुए हरियाणवी लोक संस्कृति को पुनर्जीवित करने में अपने अनुभवों को साझा किया। इस के साथ ही उन्होंने शोध के विषय को चुनने के लिए अपनी लोक संस्कृति को प्राथमिकता देने की बात कही। कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में पंजाबी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर रविन्द्र कुमार ने कार्यक्रम में उपस्थित सभी अतिथियों का हार्दिक स्वागत किया और स्वागत भाषण में  “पंजाबी, हिंदी एवं अंग्रेज़ी भाषा, साहित्य और संस्कृति में शोध विधि” विषय पर सेमिनार की आवश्यकता को स्पष्ट करते हुए कहा कि इस प्रकार का सेमिनार दिल्ली विश्वविद्यालय में अभी तक आयोजित नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि पंजाबी भाषा में शोध विधि पर बहुत कम पाठ्य सामग्री उपलब्ध है, ऐसे में इस विषय की तरफ ध्यान आकर्षित करवाना जरूरी है। शोध विषय को जनमानस से कैसे जोड़ा जाए और समाज में इसकी क्या प्रासंगिकता है, इस विषय पर भी उन्होंने अपने विचार व्यक्त किए। उनके अनुसार, पृथ्वी पर केवल मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो जिज्ञासु, सृजनकर्ता और खोजी प्रवृत्ति वाला है। अत: एक शोधार्थी का यह दायित्व है कि वह खोज एवं सृजन के माध्यम से वर्तमान समाज और आने वाली पीढ़ियों को लाभान्वित करे और उनका मार्गदर्शन करे। उन्होंने शोध कार्य में अवलोकन की प्रवृत्ति को महत्त्वपूर्ण बताया तथा शोध कार्य में आधुनिक शिक्षा, पश्चिमी शोध विधियों और पुरातन ज्ञान धाराओं में समन्वय स्थापित करने की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने यह भी कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय में विगत दो वर्षों से शोध के अनुकूल वातावरण निर्मित हुआ है, जिसका श्रेय उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर योगेश सिंह को दिया।

मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार साझा करते हुए राणा नैय्यर (पूर्व प्राध्यापक, अंग्रेज़ी विभाग, पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़) ने कहा कि शोध एक सतत आत्म चिंतन प्रक्रिया है, अत: एक शोधार्थी को आत्म चिंतक होना चाहिए।  साथ ही, उन्होंने एक शोधार्थी में जिज्ञासु प्रवृत्ति को महत्त्वपूर्ण गुण बताते हुए कहा कि शोधार्थी को छोटे बच्चे की तरह जिज्ञासु प्रवृत्ति का होना चाहिए। उन्होंने शोध कार्य में स्रोत के रूप में इंटरनेट के बढ़ रहे उपयोग और उसके जोखिमों पर चिंता जताते हुए कहा कि शोध कार्य में द्वितीयक स्रोतों की बजाय प्राथमिक अथवा मूल स्रोत पर अधिक बल दिया जाना चाहिए।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर अनिल अनेजा (अध्यक्ष, अंग्रेजी विभाग,  दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली ) ने शोध के सभी पक्षों पर ध्यान केंद्रित करते हुए कहा कि शोध मनुष्य की मूल प्रवृत्ति है। मनुष्य में यह प्रवृत्ति बचपन से ही शुरू हो जाती है। शोध सिर्फ़ साहित्य से संबंधित नहीं है, यह जीवन का अहम हिस्सा है। इसी के साथ उन्होंने किताब पढ़ने की आदत पर भी ज़ोर दिया।

गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के पूर्व कुलपति प्रो. सतिंदर सिंह ने सेमिनार के प्रथम अकादमिक सत्र की अध्यक्षता करते हुए इस सेमिनार के आयोजन के लिए प्रो. रविन्द्र कुमार बधाई दी। शोध विधि पर अपने विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि यह विषय अत्यंत महत्त्वपूर्ण है तथा इसकी सार्थकता हमेशा बनी रहेगी। शोध कार्य हेतु विषय चुनाव पर बात करते हुए उन्होंने सुझाव दिया कि विद्यार्थी को पहले किसी विषय की अवधारणाओं को समझना चाहिए तथा उससे संबंधित समस्याओं के आधार पर शोध हेतु विषय का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने पंजाबी में शोध के क्षेत्र में व्याप्त प्रमुख समस्याओं पर प्रकाश डाला। उनके अनुसार शोध कार्य गुणात्मक होने चाहिए, संख्यात्मक नहीं। प्रथम सत्र का संचालन डॉ. यादविंदर सिंह ने किया तथा इसके समापन पर डॉ. नछत्तर सिंह ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

सेमिनार के दूसरे अकादमिक सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में प्रोफेसर पी.सी. टंडन (हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय) ने शोध विधि विषय पर अपने विचार साझा करते हुए शोध के पर्यायवाची समझे जाने वाले शब्दों;  खोज, अन्वेषण, अनुसंधान तथा गवेषणा के अर्थ स्पष्ट किए। उन्होंने शोध कार्य से संबंधित विभिन्न पक्षों जैसे शोध के स्रोत, शोध की विधियां, संदर्भ सूची, शोध की प्रामाणिकता, शोध की शक्तियां एवं सीमाओं तथा शोध से संबंधित अनुशासन आदि पर अपने महत्त्वपूर्ण विचार साझा करते हुए कहा कि शोध प्रक्रिया की अपनी एक आचार संहिता होती है, जिसका अनुपालन किया जाना चाहिए।

दूसरे मुख्य वक्ता के रूप में प्रोफेसर जसविंदर सिंह (पूर्व प्राध्यापक, पंजाबी विभाग, पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला) ने ‘संस्कृति और लोक धारा के क्षेत्र में शोध कार्य’ पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि कला एवं संस्कृति और जीवन के अन्य क्षेत्रों में स्पष्ट विभाजन होना चाहिए। कला एवं संस्कृति का दायरा अत्यंत विस्तृत है, जिसकी शाखाएं जीवन के हर क्षेत्र में फैली हुई हैं। अत: इस क्षेत्र में शोध कार्य करने हेतु पहले विषय के सिद्धांतों को समझना ज़रूरी है। उनके अनुसार, एक शोधार्थी को संस्कृति, लोक संस्कृति, विरासत तथा जीवन शैली से संबंधित दर्शन से अवगत होना चाहिए और जीवन से जुड़ी रस्मों, रीति रिवाजों तथा रूढ़ियों में व्याप्त मनोभावों एवं मनोविज्ञान को समझने की कोशिश करनी चाहिए।

प्रोफ़ेसर राजेश शर्मा  (अंग्रेज़ी विभाग, पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला) ने तीसरे मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार साझा करते हुए शोध को भारतीय काव्य परंपरा के साथ जोड़ते हुए साहित्य में आने वाले तीन हेतु; उत्पति, अभ्यास व प्रतिभा को समझाया। उन्होंने बताया कि आचार्य राजशेखर, भरत मुनि, भृतहरि के मूल सिद्धांतों में शोध विधि के मूलभूत नियम निहित हैं।

उन्होंने शोध को काव्य परंपरा से जोड़ते हुए यह विचार प्रस्तुत किया कि शोध सिर्फ आधुनिक सिद्धांतों पर ही नहीं टिका है, बल्कि इसके लिए पुरातन परंपरा में मौजूद विभिन्न सिद्धांत भी महत्त्वपूर्ण हैं।

प्रोफेसर कुमुद शर्मा (अध्यक्ष, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली) ने कार्यक्रम में विशेष अतिथि के रूप शिरकत की। उन्होंने कहा कि शोध का संबंध सिर्फ नौकरी हासिल कर लेने से नहीं है बल्कि शोध कार्य अंतरराष्ट्रीय स्तर की उपयोगिता से संबंधित होना चाहिए। शोध कार्य पर अपने विचार साझा करते हुए उन्होंने सभी क्षेत्रों में होने वाले शोध की गुणवत्ता में आ रही गिरावट पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को शोध की गुणवत्ता पर ध्यान देना चाहिए। किसी भी विषय पर शोध के लिए उसके सभी पक्षों को समझना चाहिए।  कुमुद जी ने शोधार्थी के गुणों के बारे में बताते हुए, ईमानदारी, जिज्ञासा, दृढ़ता, कष्ट भोगने की तत्परता आदि गुणों पर रोशनी डाली। उन्होंने शोध के विषयों में हो रही भेड़चाल पर खेद व्यक्त करते हुए इससे बचने की सलाह दी।

विशेष अतिथि के रूप में शामिल हुए प्रोफेसर अमिताभ  चक्रवर्ती (डीन, कला संकाय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली) ने नई शिक्षा नीति के तहत भारतीय भाषाओं को पढ़ाने की पहल को लेकर चर्चा की। उन्होंने शोध विधियों आगमन और निगमन को छात्रों को समझाने की बात की, उन्होंने कहा कि अध्यापकों द्वारा अपने छात्रों को शोध विधि के बारे में सामान्य जानकारी प्रदान की जानी चाहिए। कार्यक्रम में डॉ. मनमोहन  (पूर्व आई.पी.एस. अधिकारी एवं साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त लेखक) ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की। उन्होंने शोध के वैज्ञानिक पक्ष के बारे में बात करते हुए अपने शोध के समय के अनुभव साझा किए। उन्होंने सही शोध निर्देशक का चुनाव और उपयुक्त विषय के चुनाव को महत्त्वपूर्ण बताया।  उन्होंने शोध को निरंतर अध्ययन और कठिन मेहनत वाला कार्य बताते हुए शोध विषय की सामाजिक प्रासंगिकता और शोध के सामाजिक महत्व पर प्रकाश डाला।

दूसरे सत्र के कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रोफेसर कपिल कपूर  (पूर्व पीवीसी, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली) ने की। उन्होंने कहा कि शोध कार्य में भारतीय भाषाओं को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।  उनके अनुसार, पूरी दुनिया में वही ज्ञान मूल है जो जिस रूप में है, उसी रूप में सामने आए। उन्होंने शोध व ज्ञान को महात्मा बुद्ध से जोड़ते हुए कार्यक्रम में बहुत ही रोचक बातें सुनाई। उन्होंने शोध में भेड़चाल तथा राजनीति से बचने की सलाह दी। दूसरे अकादमिक सत्र का संचालन प्रोफेसर कुलवीर गोजरा ने किया। कार्यक्रम के अंत में डॉ. बलजिंदर सिंह नसरली ने आए हुए अतिथियों, अध्यापकों एवं विद्यार्थियों को धन्यवाद ज्ञापित किया।

इस अवसर पर पंजाबी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर रविन्द्र कुमार, प्रोफेसर कुलवीर गोजरा, डॉ. बलजिंदर सिंह नसरली, डॉ. रजनी बाला,डॉ. नछत्तर सिंह, डॉ. यादविंदर सिंह तथा डॉ. रंजू बाला, पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. मंजीत सिंह के अलावा विभिन्न महाविद्यालयों और विद्यालयों के अध्यापकगण एवं पंजाबी विभाग व अन्य विभागों के छात्र उपस्थित रहे।

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