दिल्ली-NCR में प्लास्टिक प्रदूषण को लेकर बढ़ी चिंता, दूध की प्लास्टिक थैलियां बनीं बड़ी चुनौती
दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते प्लास्टिक प्रदूषण को लेकर पर्यावरण विशेषज्ञों और प्रशासनिक एजेंसियों की चिंता लगातार बढ़ रही है। हाल ही में सामने आई रिपोर्टों में दूध की प्लास्टिक थैलियों को प्लास्टिक कचरे का एक प्रमुख स्रोत बताया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि रोजाना लाखों घरों में उपयोग होने वाली ये थैलियां इस्तेमाल के बाद अक्सर कूड़े में फेंक दी जाती हैं, जिससे पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।
दिल्ली-एनसीआर जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्र में प्रतिदिन बड़ी मात्रा में दूध की खपत होती है। अधिकांश डेयरी कंपनियां दूध की पैकेजिंग के लिए प्लास्टिक पाउच का उपयोग करती हैं। उपयोग के बाद इन थैलियों का उचित निपटान नहीं होने के कारण बड़ी मात्रा में प्लास्टिक कचरा नालों, सड़कों, खाली भूखंडों और लैंडफिल साइटों तक पहुंच जाता है। इससे न केवल सफाई व्यवस्था प्रभावित होती है, बल्कि जल निकासी तंत्र भी बाधित होता है।
पर्यावरणविदों का मानना है कि प्लास्टिक थैलियां आसानी से नष्ट नहीं होतीं और वर्षों तक पर्यावरण में बनी रहती हैं। कई बार ये नाले और सीवर लाइनें जाम कर देती हैं, जिससे बारिश के दौरान जलभराव की समस्या और बढ़ जाती है। इसके अलावा प्लास्टिक के छोटे-छोटे कण मिट्टी और जल स्रोतों में मिलकर पर्यावरण तथा मानव स्वास्थ्य के लिए भी खतरा पैदा कर सकते हैं।
विशेषज्ञ दूध की पैकेजिंग के लिए अधिक पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों को अपनाने पर जोर दे रहे हैं। साथ ही लोगों से प्लास्टिक कचरे को अलग से एकत्र कर रीसाइक्लिंग के लिए भेजने की अपील की जा रही है। कई सामाजिक और पर्यावरणीय संगठन भी जागरूकता अभियान चला रहे हैं ताकि नागरिक प्लास्टिक उपयोग को कम करने की दिशा में योगदान दे सकें।
प्रशासन का कहना है कि प्लास्टिक प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयास किए जा रहे हैं। यदि नागरिक, उद्योग और सरकार मिलकर काम करें तो दिल्ली-एनसीआर को प्लास्टिक प्रदूषण की बढ़ती समस्या से काफी हद तक राहत दिलाई जा सकती है।




