धान के डेढ़ फीट तक ऊंचे हो जाने वाले पौधे कम पानी से रह गए 5 इंच

बारिश की जबर्दस्त कमी का बुरा असर अब खेती पर नजर अाने लगा है। भास्कर टीम ने रायपुर से 50 किमी के दायरे में रायपुर, दुर्ग, बलौदाबाजार और धमतरी के सीमावर्ती इलाकों का जायजा लिया और पाया कि धान के जिन पौधों को अभी तक डेढ फीट तक ऊंचा हो जाना चाहिए, 5 इंच तक के ही रह गए हैं। खेतों की मिट्टी दलदली होनी थी, लेकिन इतनी सख्त है कि बैलगाड़ियां गुजर रही हैं। बारिश औसत से 25 से 50 फीसदी तक कम है।

तकरीबन सभी जगह किसानों का कहना है कि अब बारिश हो भी गई तो पौधे खराब हो चुके हैं, अब नहीं सुधरेंगे और करीब 20 फीसदी फसल खराब होने की अाशंका है। सांकरा और जामगांव-एम के किसानों ने बताया कि अब तक फुहारें ही पड़ी हैं, इसलिए जमीन गीली नहीं हो पाई है। जोताई के बाद बीज रोपते हैं, फिर जर्मनेशन की प्रक्रिया होती है। लेकिन 50 फीसदी इलाकों में रोपाई ठीक से नहीं हुई, इसलिए खाद नहीं डाली जा सकी है।

जुलाई का महीना खत्म होने को है और यह समय बियासी करने के बाद चलाई का होता है। हरेली से पहले बियासी हर जगह हो जाती है, लेकिन अब हरेली को सिर्फ 7 दिन बचे हैं और बियासी बिलकुल शुरुअाती दौर में है।
फसल की रुक गई बाढ़

सिसदेवरी (पलारी) में धान के पौधे तीन-चार इंच ऊंचे ही हुए हैं, जबकि अभी तक एक से डेढ़ फीट हो जाना चाहिए थे। अासपास के सभी जिलों में धान के पौधों की अधिकतम औसतन ऊंचाई फिलहाल 6 इंच से ज्यादा नहीं हुई है, अर्थात पानी की कमी से ग्रोथ पूरी तरह रुक गई है। यहां के किसानों ने बताया कि मानसून के पहले से ही किसान पूरी तैयारी के साथ खेतों में उतरे थे, लेकिन अब हताशा फैल रही है। खेती का काम पूरी तरह रुक गया है। खेत भी खाली-खाली नजर अा रहे हैं।

गांव-गांव का यही दर्द : इसके लिए अमलेश्वर, सांकरा, जामगांव-एम, फुंडा, सांतरा, तर्रा, दोंदे, सारागांव, खौना, खरोरा, पलारी, सिसदेवरी, पटारीड़ीह, कुसमी, वटगन, कनेरा, कुम्हारी, चिखली, पठारीडीह, सेजबहार, खिलौरा, छछानपैरी, भरेंगाभाठा, चंडी, मानिकचौरी, गातापार का जायजा लिया आैर वहां के किसानों से बात की। पलारी, सिसदेवरी के धर्मेन्द्र चंद्राकर का कहना है कि पूरे एरिया में सूखे के हालात हैं। खेत सूख चुके हैं। खेती-किसानी का काम बंद हो चुका है। इसी गांव के सुरेश चंद्राकर ने बताया कि हमने जिस स्थिति में धान बोया था, वह पानी की कमी के कारण अब बैठने लगा है। अभनपुर में गातापार के किसान टीकमचंद ने कहा कि रोज बादल छाने के बाद थोड़ी उम्मीद जगती है, लेकिन फुहारों से मायूसी हो रही है। सांकरा के किसान महेश साहू का कहना है कि बारिश की उम्मीद से रोज खेत जा रहे हैं और शाम को मायूस लौट रहे हैं।

नहरें-नाले भी सूखने लगे : पलारी, सिसदेवरी, पटारीड़ीह, कुसमी इलाकों में सिंचाई के लिए नहरों का उपयोग भी किया जाता है। नहरों में पानी रहता है, इसलिए इससे लगे खेतों में ज्यादा दिक्कत नहीं अाती। लेकिन बांध और नहरें, सभी जगह पानी कम है। इसलिए अरसे बाद नहर-नालों के किनारे के खेत भी सूख रहे हैं।

जिले बारिश सामान्य कमी
रायपुर 237.7 439.3 46
बालोद 275.2 430.3 36
बलौदाबाजार 225 405 44
बलरामपुर 308 486 37
बस्तर 489 522 6
बेमेतरा 202.7 435.7 52
बीजापुर 458 515 11
बिलासपुर 315 457 31
दंतेवाड़ा 430 554 22
धमतरी 464 436 07
दुर्ग 245.6 428 43
गरियाबंद 429 446 04
जांजगीर 286 466 39
जशपुर 315 633 50
कवर्धा 206 340 39
कांकेर 374 515 27
कोरबा 297 555 47
कोरिया 337 495 32
महासमुंद 380 443 14
मुंगेली 231 427 46
नारायणपुर 492 495 01
रायगढ़ 305 518 41
राजनांदगांव 223 415 46
सुकमा 422 465 09
सूरजपुर 368 489 25
सरगुजा 232 567 59
(बारिश मिमी में व कमी प्रतिशत में)

बांधों में 59 फीसदी तक कम पानी : पिछले 15 दिन से थमी बारिश से प्रदेशभर के बांध जुलाई के अंतिम सप्ताह में भी सूखे हैं और सभी में पानी का स्तर अभी के औसत से 20 से 59 फीसदी तक कम है। राजधानी रायपुर को पानी देने वाले गंगरेल बांध में भी अभी केवल 53 फीसदी पानी है।

जबकि पिछले साल 24 जुलाई तक यह 71.12 प्रतिशत भर चुका था : छत्तीसगढ़ में छोटे-बड़े 44 बांध हैं, जिनमें कोरबा का मिनिमाता बांगो बांध सबसे बड़ा है। इसमें पानी की कुल क्षमता 2894 क्यूबिक मीटर है, जबकि 24 जुलाई तक यह 1533.33 क्यूबिक मीटर यानी क्षमता से 53 फीसदी ही भर पाया है। पिछले साल इसी समय यह बांध 71.12 प्रतिशत भर चुका था। राजधानी रायपुर को पानी देने वाला गंगरेल बांध में भी इस समय जलभराव कम है। धमतरी के रविशंकर जलाशय में इस समय लाइव कैपेसिटी इन फुल रिजरवायर 767 क्यूबिक मीटर है जबकि महज 171.83 क्यूबिक मीटर यानी बांध की क्षमता का महज 22.4 प्रतिशत पानी ही भर पाया है। पिछले साल इसी समय तक गंगरेल में 31.26 प्रतिशत पानी था।

सभी बांधों का औसत जलभराव 37.10 प्रतिशत : राज्य के सभी 44 बांधों का जलभराव 24 जुलाई 2019 तक महज 37.10 प्रतिशत है। पिछले साल इसी समय तक सभी बांधों का औसत जलभराव 53.50 प्रतिशत था। 2017 में स्थिति थोड़ी और बेहतर थी। तब सभी बांधों का जलभराव 55.09 प्रतिशत था। राज्य में बारिश के लिए एक महीने का वक्त और है। छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा बारिश जुलाई और अगस्त में होती है। जुलाई लगभग बीत चुका है लेकिन अगस्त का पूरा महीना बाकी है। अगस्त में अच्छी बारिश हुई तो स्थिति बेहतर हो सकती है। सितंबर में भी 15 से 20 तारीख तक छिटपुट बारिश होती है।

प्रमुख बांधों में अब तक पानी और कमी
बांध            – 2019   — 2018
मिनिमाता बांगो (कोरबा)       -53.00   – 71.12
रविशंकर (गंगरेल)      – 22.40   – 31.26
तांदुला (बालोद)     – 19.64   – 30.14
दुधावा (कांकेर)     – 19.80    – 23.88
सिकासार (गरियाबंद)       – 33.94    – 92.72
खारंग (बिलासपुर)     – 27.02      – 43.40
सोंढूर (धमतरी)    – 30.08      – 47.89
कोडार (महासमुंद)    – 17.87       – 21.95
खरखरा (बालोद)       – 18.18       – 27.11
(प्रतिशत में)

बांधों ने रोक दिया नदी का प्रवाह, रेत खनन ने जलचक्र खत्म किया : जतमई-घटारानी सूखने तथा बांधों में औसत से 50 फीसदी तक ही पानी भरने के मामले में दैनिक भास्कर ने देर रात प्रसिद्ध पर्यावरणविद मेधा पाटकर से बात की। उन्होंने कहा-नदी का प्रवाह बचाने के लिए पूरी नदी घाटी को एक इकाई मानकर प्लान करना होगा। माइक्रो, मिनी लेवल पर वॉटर शेड्स बनाने होंगे। अफसोस की बात है कि नर्मदा भी सूख रही है। पिछले साल हमने नदी को पैदल ही पार कर लिया। अवैध रेत खनन ने नदियों के जलचक्र को खत्म कर दिया है।

जहां तक छत्तीसगढ़ के प्राकृतिक स्त्रोतों और झरनों की बात है, ऊपर बांध में पानी रुका होगा। इससे भी नदी सूख जाती है। वनों की कमी से भी नैचुरल फ्लो नहीं रह गया है। नर्मदा के साथ भी यही हुआ, बाकी बड़ी नदियों के साथ भी यही हो रहा है।

मेधा पाटकर ने कहा कि जनसहभागिता से नदी घाटी में जल नियोजन करना चाहिए। बड़ी नदियों पर बड़े बांध न बांधते हुए कैचमेंट को कैच करना चाहिए। नदी घाटी को एक इकाई मानना होगा, तभी जाकर हम नदियों को बचा पाएंगे। नदी बेसिन के इलाके में ही मिनी वॉटर शेड्स से माइक्रो वॉटर शेड्स बनाए जाने चाहिए।

पीढ़ियों के पेड़ खत्म हुए नदी कहां बचेगी  : नदी क्षेत्र में वन आच्छादन पूरी तरह खत्म हो रहा है। बड़े बांध बनाते वक्त पीढ़ियों पुराने पेड़ खत्म कर दिए गए। नतीजा सामने है नदियों में पानी नहीं बच पा रहा है। नदियों को बचाने के लिए ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने होंगे। छत्तीसगढ़ में मौजूदा सरकार नदियों को बचाने के लिए गंभीर नजर आती है। मुख्यमंत्री अच्छा काम कर रहे हैं। मध्यप्रदेश सरकार ने भी संवाद शुरू किया है।

सरकार को पेयजल बचाने की चिंता : राज्य में बारिश नहीं होने के कारण बांधों में इतना पानी नहीं है कि सिंचाई के लिए दिया जा सके। गंगरेल से रायपुर शहर में पेयजल के साथ ही भिलाई स्टील प्लांट को पानी दिया जाता है। फिलहाल गंगरेल में इतना पानी नहीं है कि सिंचाई के लिए दिया जा सके।

क्योंकि आगे अच्छी बारिश नहीं होने पर राजधानी में पेयजल संकट की स्थिति बन जाएगी। जल संसाधन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि सभी बांधों में पिछले साल के मुकाबले पानी काफी कम है। जिन बांधों का पानी पेयजल या उद्योगों के लिए दिया जाता है, वहां फिलहाल सिंचाई के लिए नहीं दिया जा सकता।

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