मध्य प्रदेश के इस गांव में महिलाओं और छात्रों ने दीवारों पर हरे रंग से उकेरे मोहक चित्र

मध्य प्रदेश में सतपुड़ा की वादियों में बसे होशंगाबाद जिले के गांव छेड़का की प्रसिद्धि अब गांधीवादी गांव के रूप में होने लगी है। ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से फैसला लेकर गांव को ‘ग्रीन विलेज’ की थीम पर भी विकसित करने का संकल्प लिया है। घरों की बाहरी दीवारों पर हरा रंग पोतने के साथ उन पर आकर्षक पेंटिंग उकेरी गई हैं। यह युक्ति कमाल कर रही है। गांव की हरीभरी छवि पर्यावरण संरक्षण का संदेश तो दे ही रही है, सतपुड़ा टाइगर रिजर्व तक पहुंचने वाले देशीविदेशी पर्यटकों को भी लुभा रही है। इससे यहां पर्यटन क्षेत्र से जुड़े रोजगार के अवसर सृजित हो सकते हैं।

अभावों का पर्याय रहे 800 की आबादी वाले छेड़का गांव का चार साल में ही कायापलट हो चुका है। यह संभव हुआ है एक गांधीवादी विचारक की सोच और प्रयास से। यह शख्स हैं आयकर विभाग में बतौर डायरेक्टर जनरल पदस्थ आरके पालीवाल। उन्होंने इस गांव को पिछड़ेपन से मुक्तकराने का बीड़ा उठाया है। गांधी ग्रामसेवा केंद्र भी उनकी इस मुहिम में मददगार बन गया है।

सतपुड़ा के जंगल में अंतिम छोर पर बसे इस गांव से आठ किमी दूर प्रसिद्ध पर्यटन स्थल मढ़ई भी मौजूद है। यहां आने वाले पर्यटकों की भी रुचि अब इस गांव को देखने में बढ़ने लगी है। पालीवाल, गांधी ग्रामसेवा केंद्र से जुड़े कुछ संगठनों और गांधीवादियों के सुझाव पर यहां के आदिवासियों ने अपने घरों को हरे रंग से सजाने-संवारने की मुहिम शुरू की। गांव के 70-75 घरों की बाहरी दीवारों पर तोतापंखी हरा रंग चढ़ाया जा रहा है। हरे रंग का डिस्टेंपर कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं और गांधी ग्रामसेवा केंद्र ने उपलब्ध करवा दिया है। ग्रामीणों ने हरे रंग से दीवारों को रंग पारंपरिक कला के अनुरूप इनपर खूबसूरत ‘मांडने’ और फूल-पत्तियां उकेर दीं। होशंगाबाद और भोपाल से आए कॉलेज के छात्र-छात्राओं ने भी सुंदर चित्रकारी कर गांव को ग्रीन विलेज की थीम पर संवारने में योगदान दिया।

गांव की सरपंच रेवती दिनेश धुर्वे बताती हैं कि पालीवाल साहब और गांधी केंद्र के सहयोग से हमारे पिछड़े गांव के भाग्य खुल गए हैं। दीवारों पर हरा रंग ही क्यों? इस पर वे बताती हैं कि जंगल की हरियाली के बीच हमारे घर भी उसी का हिस्सा दिखने लगे हैं। यह बात जंगलों से हमारे जुड़ाव को बढ़ाने का काम कर रही है और पर्यटकों को गांव तक ला रही है। गांव की चौपाल पर मौजूद रोजगार सहायक ममता माझी, गांधी केंद्र की सीमा ककोड़िया और सुस्मिता धुर्वे कहती हैं कि हम लोगों ने घरों के आगे- पीछे और गांव में जहां भी खाली जमीन है, वहां पौधे रोपे हैं। अगले चरण में गांव के सूखे पड़े तालाब की गहराई और दायरा बढ़ाने के साथ रेन वाटर हार्वेस्टिंग लगाने की योजना भी है। पेयजल के लिए सार्वजनिक नल और पानी की टंकी बन गई है। गांधी सेवा केंद्र ने आमदनी बढ़ाने ग्रामीण महिलाओं को साबुन निर्माण, सिलाई और जैविक अनाज-सब्जियां उगाने का प्रशिक्षण दिलवाया है।

फाइवस्टार रिसोर्ट बनाम ग्रीन विलेज 

गांधी केंद्र के सहयोगी और छेड़का निवासी हेमंत नागर, दिनेश धुर्वे कहते हैं, हमारे पड़ोसी गांव मढ़ई के निकट बड़े-बड़े रिसोर्ट बने हैं, जहां फाइव स्टार सुविधाएं जुटाई गई हैं, वहीं छेड़का अभावों से घिरा है। हमारे प्राकृतिक सुंदर घर इन फाइव स्टार रिसोर्ट को टक्कर दे सकते हैं। मौजूदा दौर की चुनौतियों के बीच यह आदिवासी गांव अब खुद को अपनी मूल प्रकृति की ओर ले जा रहा है। आरके पालीवाल कहते हैं कि ग्रीन विलेज की मुहिम ग्रामीणों में पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छता का संदेश तो दे ही रही है, रोजगार के अवसर भी बन रहे हैं। अनेक संस्थाएं अब इस गांव पर ध्यान देने लग गई हैं।

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