कांग्रेस की लोकसभा चुनाव में करारी हार, परिवर्तन के बिना मुश्किल दिख रही कामयाबी

आम चुनाव में करारी पराजय झेलने के बाद कांग्रेस पार्टी में तमाम मान- मनौव्वल के बावजूद राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफे को लेकर अडिग बताए जा रहे हैं, तो वहीं कुछ प्रदेश इकाइयों के नेताओं की ओर से भी इस्तीफा देने की बात सामने आ रही है। कांग्रेस इस हार से बुरी तरह आहत है, लेकिन इसके लिए वह खुद भी जिम्मेदार है। यह कहना गलत नहीं होगा कि कांग्रेस ने 2019 के चुनाव में नरेंद्र मोदी और भाजपा को जीत एक तरह से तोहफे में दे दी।

सच तो यह है कि देश की ये सबसे पुरानी पार्टी अनेक मोर्चों पर लड़खड़ा गई। यह चुनाव से पूर्व भाजपा के खिलाफ सीधी जंग के लिहाज से एक अखिल भारतीय गठबंधन तैयार करने में नाकाम रही। इसका चुनावी विमर्श भी बेरोजगारी, कृषि व ग्रामीण संकट, संस्थाओं का क्षरण और सामाजिक विभाजन जैसे ज्वलंत मुद्दों पर टिके रहने के बजाय भटका हुआ नजर आया। यहां तक कि यह अपनी महत्वाकांक्षी न्याय (न्यूनतम आय सुरक्षा) योजना का संदेश भी लक्षित वर्ग तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुंचा सकी। वह लगातार ‘चौकीदार चोर है’ के नारे पर जोर देती रही। इस क्रम में उसे यह एहसास नहीं रहा कि यह उसी के लिए घातक हो सकता है। उसने बीते पांच साल विपक्ष में रहते हुए अपने संगठन की खामियां दूर करने या ऐसी चुनावी मशीनरी विकसित करने के लिए कुछ नहीं किया, जो भाजपा के सांगठनिक तंत्र का मुकाबला कर सके।

हालांकि यदि हम चुनाव नतीजों की बारीकी से पड़ताल करें तो एक अलग ही कहानी सामने आती है। नरेंद्र मोदी को पिछली बार से भी ज्यादा बड़े बहुमत के साथ प्रधानमंत्री के तौर पर दूसरा कार्यकाल देते हुए मतदाताओं ने एक सख्त संदेश दिया कि कांग्रेस अब उनकी नजरों से उतर चुकी है। लगातार दूसरी बार कांग्रेस लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के लिए भी दावा नहीं कर पाएगी, क्योंकि वह इसके लिए जरूरी न्यूनतम सीटें जीतने में नाकाम रही है। ये नतीजे बहुत कुछ कहते हैं। ऐसे तमाम राज्यों में जहां इसका भाजपा के साथ सीधा मुकाबला था, वहां मतदाताओं ने मोदी को जबर्दस्त समर्थन दिया। ऐसा उन राज्यों में भी हुआ, जहां छह महीने पहले ही कांग्रेस ने भाजपा को सत्ता से बेदखल किया था।

मसलन मध्य प्रदेश में भाजपा का वोट शेयर 58 फीसद तक चढ़ गया, वहीं कांग्रेस 34.5 प्रतिशत तक सिमट गई। राजस्थान में भी यही कहानी रही, जहां भाजपा ने पिछली बार की तरह सभी 25 सीटें जीतते हुए कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया। गुजरात में भाजपा ने अभूतपूर्व ढंग से 62.2 प्रतिशत मत प्राप्त किए, जबकि कांग्रेस को इससे आधे मत भी नहीं मिले। मतदाताओं का इससे मुखर संदेश और क्या हो सकता था?

दिल्ली और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भाजपा के शानदार आंकड़ों से वह तर्क भी ध्वस्त हो जाता है कि कांग्रेस रणनीतिक साझेदारियों के जरिये अपनी कमजोरियों की भरपाई करते हुए विपक्ष के आंकड़ों के सहारे मोदी की केमिस्ट्री को मात दे सकती थी। दिल्ली में भाजपा का वोट शेयर 56 फीसद तक पहुंच गया। कांग्रेस यहां काफी पीछे रह गई। और फिर उत्तर प्रदेश भी है, जहां पर कांग्रेस को बसपा प्रमुख मायावती और सपा के मुखिया अखिलेश यादव के अलावा सियासी विश्लेषकों द्वारा भी इसलिए भला-बुरा कहा गया कि उसने मोदी को हराने के लिए व्यापक विपक्षी हितों के बजाय अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को तरजीह दी।

क्या कांग्रेस राज्य में अपनी कमजोर स्थिति के लिहाज से रायबरेली और अमेठी जैसी दो परंपरागत सीटों पर सहमत होते हुए महागठबंधन में शामिल नहीं हो सकती थी? इस तरह के तर्क खूब चलते रहे। लेकिन यूपी से मिला जनादेश विपक्षी आंकड़ों के तर्क को उलट देता है। भाजपा ने न सिर्फ सियासी रूप से सर्वाधिक अहम इस राज्य में अपने वोट शेयर को 49.6 फीसद तक पहुंचा दिया, बल्कि उसने सपा, बसपा और कांग्रेस के सम्मिलित मतों से छह फीसद अधिक मत प्राप्त किए। खुद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को अमेठी में स्मृति ईरानी के हाथों शर्मिंदगीपूर्ण ढंग से हार झेलनी पड़ी, जबकि यह सीट 1980 से ही गांधी परिवार के कब्जे में रही थी।

कांग्रेस ने 2019 में भले ही 2014 के मुकाबले आठ ज्यादा सीटें जीती हों और 44 से बढ़कर 52 पर पहुंच गई हो, लेकिन यह न भूलें कि उसने ज्यादातर सीटें उन तीन राज्यों में जीतीं, जहां स्थानीय कारक हावी रहे। कांग्रेस ने केरल में तेजी से अलोकप्रिय होती माकपा के खिलाफ 15 सीटें जीतीं, तमिलनाडु में वह द्रमुक के सहारे आठ सीटें जीतने में कामयाब रही और पंजाब में अपने मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की लोकप्रियता के बूते आठ सीटों पर विजयी रही। इन 31 सीटों के बगैर कांग्रेस महज 21 पर सिमट सकती थी।

अब कांग्रेस के नेतागण अपनी पार्टी की खराब हालत के जवाब में यह तर्क दे रहे हैं कि 1984 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को भी तो सिर्फ दो सीटें मिली थीं। लेकिन वे दो अहम बिंदुओं को नजरअंदाज कर देते हैं। पहला यह कि इसके बाद 1986 में भाजपा ने अपना अध्यक्ष बदला। अटल बिहारी वाजपेयी की जगह लालकृष्ण आडवाणी ने कमान संभाली। दूसरा बिंदु यह कि आडवाणी ने संघ के साथ मिलकर काम करते हुए भाजपा को कट्टर हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी के सांचे में ढाला और इसे नए सिरे से खड़ा किया। उसकी नई परिकल्पना 1989 के उस पालमपुर प्रस्ताव में झलकी, जिसके तहत उसने औपचारिक रूप से विहिप के अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के एजेंडे को अपना लिया।

वर्ष 1989 के चुनाव में भाजपा मुख्यत: इसी एजेंडे को लेकर चुनाव लड़ी और संसद में अपनी सदस्य संख्या 86 तक पहुंचाने में कामयाब रही। अब देश के मतदाताओं ने अपने मन की बात कह दी है और कांग्रेस को दीवार पर लिखी इबारत को पढ़ना होगा। यह बात मायने नहीं रखती कि राहुल पार्टी अध्यक्ष बने रहते हैं या फिर किसी नए चेहरे के लिए राह प्रशस्त करते हैं। कांग्रेस को देश के मतदाताओं के मानस में पुन: अपनी जगह बनाने की राह तलाशनी होगी, तभी वह 21वीं सदी में प्रासंगिक बनी रह सकती है।

कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी ने वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव को भारत के बारे में दो जुदा विचारों की लड़ाई के रूप में निरूपित किया था। हालांकि मतदाताओं के मानसपटल पर वे किसी भी प्रकार का प्रभाव छोड़ने में पूरी तरह से विफल रहे हैं। देश की अधिकांश जनता ने नरेंद्र मोदी के सशक्त राष्ट्रवाद को चुना। इसके कई कारण भी रहे हैं। हमारी राजनीति व्यापक रूप से बदल रही है। इसलिए जरूरी है कि ठोस बदलाव करके राहुल गांधी उसमें से भ्रष्टाचार में लिप्त और वीआइपी संस्कृति में डूबे पुराने चेहरों से कांग्रेस को मुक्त करें और भविष्य के लिए ऐसे नए चेहरे तैयार करें जो आवश्यकता पड़ने पर पार्टी की बागडोर संभालने में सक्षम हों।

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