एयरबस विमान खरीद में हुआ था 1000 करोड़ रुपये से अधिक का घोटाला

संप्रग सरकार के दौरान हुई एयरबस विमान खरीद में 1000 करोड़ रुपये से अधिक का घोटाला हुआ था। इसके लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता वाली सुरक्षा से संबंधित मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीएस) के फैसले को ही बदल दिया गया था। घोटाले के सारे सुबूतों से लैस प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने तत्कालीन नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल को पूछताछ के लिए समन भेजा है। पटेल से गुरुवार को दिल्ली स्थित ईडी मुख्यालय में पूछताछ होगी।

ईडी के पास मौजूद दस्तावेजों के अनुसार, 2006 में सीसीएस ने एयरबस से 43 विमानों की खरीद को हरी झंडी दी थी। समिति ने यह भी तय कर दिया था कि किस कीमत पर ये विमान खरीदे जाएंगे। इसके साथ यह शर्त भी जोड़ी गई थी कि एयरबस को 17.5 करोड़ डॉलर (लगभग 1000 करोड़ रुपये) की लागत से भारत में ट्रेनिंग, मेंटिनेंस, रिपेयर और ओवरहॉलिंग की सुविधा विकसित करनी होगी। ताकि पायलटों की ट्रेनिंग से लेकर विमानों के रखरखाव पर अतिरिक्त बोझ न पड़े।

सीसीएस की हरी झंडी मिलते ही एयर इंडिया ने एयरबस से 43 विमान खरीदने का फैसला किया। इसके लिए एयरबस के साथ समझौते पर हस्ताक्षर हो गए। समझौते में विमान की कीमत तो वही रखी गई, लेकिन ट्रेनिंग, मेंटिनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल की सुविधा विकसित करने के लिए भारत में 1000 करोड़ रुपये के निवेश की शर्त को हटा दिया। इस तरह से एयरबस को सीधे-सीधे 1000 करोड़ रुपये का फायदा पहुंचाया गया। बात यहीं खत्म नहीं हुई। सीसीएस की शर्त हटाने के साथ ही समझौते में प्रावधान-16 के तहत एक नई शर्त जोड़ दी गई।

इसके अनुसार, नए विमान उड़ाने और अन्य ट्रेनिंग के लिए एयर इंडिया को अपने पायलट और स्टाफ को फ्रांस स्थित ब्लॉनैक, जर्मनी के हैमबर्ग, अमेरिका के मियामी या फिर चीन के बीजिंग स्थित एयरबस के ट्रेनिंग सेंटर में भेजना था। इसमें यह भी जोड़ा गया कि ट्रेनिंग के लिए अपने स्टॉफ के आने-जाने से लेकर रहने, खाने-पीने तक सारा खर्च एयर इंडिया उठाएगा। साथ ही ट्रेनिंग के दौरान एयरबस के प्रशिक्षकों, ट्रेनिंग में प्रयुक्त होने वाले साजो-सामान समेत सारा खर्च एयर इंडिया पर डाल दिया गया। इस तरह, सीसीएस की शर्त हटने से जहां एयरबस भारत में 1000 करोड़ रुपये का निवेश करने से बच गया। वहीं, एयर इंडिया पर अपने पायलटों व स्टाफ की विदेश में ट्रेनिंग का अतिरिक्त बोझ भी डाल दिया गया।

ईडी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि सीसीएस के फैसले का उल्लंघन करने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता, लेकिन एयरबस से विमान खरीद में ऐसा हुआ। आश्चर्य की बात है कि संप्रग सरकार में इसे न सिर्फ आसानी से होने दिया गया, बल्कि किसी ने सवाल भी नहीं उठाया। उस वक्त के उड्डयन सचिव और अन्य अधिकारियों से पूछताछ में इस बात का कोई जवाब सामने नहीं आया कि सीसीएस की शर्त को समझौते से हटाकर नई शर्त क्यों डाली गई। अब तत्कालीन उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल को इसका जवाब देना होगा। साथ ही यह भी बताना होगा कि उड्डयन मंत्री रहते हुए उन्होंने इस पर सवाल क्यों नहीं उठाया।