इस खतरनाक बीमारी का इलाज ढूंढ़ने के करीब शोधकर्ता, 1 लाख बच्चों की गई है जान

पूर्वांचल का शोक कही जाने वाली इंसेफेलाइटिस नामक बीमारी का असर शून्य करने के लिए दिल्ली से सटे हरियाणा के मानेसर स्थित नेशनल ब्रेन रिसर्च सेंटर में तेजी से शोध चल रहा है। वैज्ञानिकों का प्रयास है कि जल्द शोध पूरा हो। वर्ष 2012 से 2016 के दौरान एक बार मिनोसाइक्लीन नामक दवा पर क्लीनिकल ट्रायल लखनऊ स्थित किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में किया गया था, लेकिन अपेक्षाकृत परिणाम सामने नहीं आने पर शोध लगातार जारी है। अब पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद ही फिर से क्लीनिकल ट्रायल किया जाएगा।

जानकारों के मुताबिक, वर्ष 1977 के दौरान इंसेफेलाइटिस नामक बीमारी का पता चला था। पूरे देश में अब तक एक लाख से अधिक बच्चे इसके शिकार हो चुके हैं। सबसे अधिक पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल एवं असम इलाके के बच्चे मौत के शिकार हुए हैं। वर्ष 2017 के दौरान पूर्वी उत्तर प्रदेश में 400 से अधिक बच्चे मौत का शिकार हुए थे। यह बीमारी 15 साल तक के बच्चों को ज्यादा होती है। वैसे असम के कई इलाकों में अधिक उम्र के लोगों में भी शिकायत आने लगी है।

शोध में पाया गया है कि क्यूलैक्स नामक मच्छर के काटने से इंसेफेलाइटिस (जेई, जापानी इंसेफेलाइटिस) की बीमारी होती है। यह मच्छर अमूमन धान के खेतों में पाया जाता है। यह मच्छर अमूमन 300 लोगों को काटता है तो किसी एक को इंसेफेलाइटिस की बीमारी होती है। क्यूलैक्स नामक मच्छर खत्म हो जाए या पैदा ही न हो, इसके ऊपर एनबीआरसी में अभी शोध नहीं शुरू हुआ है। फिलहाल, मच्छर काटने के बाद उसका प्रभाव कम हो, उसके ऊपर शोध चल रहा है। मिनोसाइक्लीन नामक मेडिसिन एंटी बैक्टेरियल है। प्रारंभिक शोध में यह सामने आया है कि इस मेडिसिन के इस्तेमाल से मच्छर का प्रभाव कम हो सकता है, पूर्णत: खत्म नहीं।

धान की फसल के नीचे जमा पानी में पनपते हैं मच्छर

जापानी इंसेफेलाइटिस की बीमारी धान की फसल के दौरान अधिक होती है। धान की फसल के नीचे जो पानी जमा होता है, उसी में क्यूलैक्स नामक मच्छर पनपते हैं। खेतों में काम करने के दौरान कई बार लोग अपने बच्चों को साथ लेकर चले जाते हैं। इस वजह से मच्छर बच्चों को काट लेता है। मच्छर काटने के बाद जैसे ही उसका प्रभाव शुरू होता है वैसे ही काफी तेज बुखार आता है। फिर सिरदर्द, ऐंठन, उल्टी, चलने में परेशानी से लेकर बेहोशी जैसी परेशानी पैदा हो जाती है। इससे तेजी से रोगी का शरीर कमजोर होता जाता है। गर्दन में जकड़न की भी शिकायत आ जाती है। अधिक प्रभाव होने पर रोगी लकवा जैसी परेशानी के भी शिकार हो जाते हैं।

जागरूकता ही इस बीमारी से बचने का बेहतर समाधान

जानकारों का मानना है कि इस बीमारी से बचने का सबसे बेहतर समाधान जागरूकता है। लोग अपने बच्चों को लेकर धान के खेतों में न जाएं। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर इलाके में पिछले कुछ वर्षों के दौरान काफी जागरूकता पैदा हुई है।

वहां के स्थानीय निवासी व इंसेफेलाइटिस उन्मूलन अभियान के मुख्य अभियानकर्ता डॉ. आरएन सिंह कई वर्षों से मलेरिया की तरह ही राष्ट्रीय अभियान चलाने की मांग कर रहे हैं। इसका असर यह हुआ है कि सरकार ने जागरूकता के ऊपर जोर देना कुछ हद तक शुरू किया है। यही नहीं टीका अभियान भी चलाया जाता है, लेकिन डॉ. आरएन सिंह कहते हैं कि जब तक राष्ट्रीय अभियान नहीं चलाया जाएगा, तब तक लोगों में हर स्तर पर जागरूकता नहीं पैदा होगी।

डॉ. आरएन सिंह (मुख्य अभियानकर्ता, इंसेफेलाइटिस उन्मूलन अभियान, गोरखपुर) ने बताया कि लगातार आंदोलन चलाए जाने के बाद वर्ष 2014 में इंसेफेलाइटिस को लेकर राष्ट्रीय प्रोग्राम तैयार हो गया लेकिन उसे लागू नहीं किया गया। मलेरिया की तरह पूरे देश में राष्ट्रीय प्रोग्राम चलाने की आवश्यकता है। वैसे तो पूरे देश में हर साल इस बीमारी के गिरफ्त में हजारों बच्चे आते हैं लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल एवं असम में अधिक समस्या है। केंद्र सरकार को जल्द से जल्द राष्ट्रीय कार्यक्रम लागू करना चाहिए।

अनिर्बान बासु (वैज्ञानिक, बायोटेक्नोलॉजी विभाग, एनबीआरसी, मानेसर गुरुग्राम) का कहना है कि इंसेफेलाइटिस के ऊपर तीन जून 2004 से शोध चल रहा है। मिनोसाइक्लीन नामक मेडिसिन के ऊपर एक बार क्लीनिकल ट्रायल किया गया था। किसी भी प्रकार की शिकायत न रहे, इसके लिए लगातार शोध जारी है। नार्थ ईस्ट के इलाके में अधिक उम्र के लोग मच्छर के शिकार हो रहे हैं। इसे ध्यान में रखकर भी शोध किया जा रहा है।

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