भिक्षु बनने की चाह रखने वाले प्रताप सारंगी को दो मंत्रालयों का दायित्व मिला

  • मोदी मंत्रिमंडल में सारंगी राज्यमंत्री बने, दो मंत्रालयों की जिम्मेदारी मिली
  • सारंगी को ‘ओडिशा का मोदी’ कहा जाता है, सफेद दाढ़ी, सिर पर सफेद कम बाल, साइकिल और बैग इनकी पहचान है
  • नरेंद्र मोदी जब भी ओडिशा जाते हैं, सारंगी से जरूर मिलते हैं

नई दिल्ली. पहली बार सांसद बने ओडिशा के प्रताप सारंगी को मोदी मंत्रिमंडल में जगह मिली है। उन्हें सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय में राज्य मंत्री के साथ ही पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन मंत्रालय में भी राज्य मंत्री का दायित्व मिला है। सफेद दाढ़ी, सिर पर सफेद कम बाल, साइकिल और बैग ही सारंगी की पहचान है। उन्होंने न्यूज एजेंसी से बात करते हुए कहा कि “मैं राजनीति को राष्ट्र सेवा का माध्यम मानता हूं। मैं राष्ट्र को पहले, पार्टी को दूसरे और खुद को तीसरे नंबर पर रखता हूं। सत्ता के साथ मेरी जीवनशैली नहीं बदलेगी।”

 

रामकृष्ण मठ में भिक्षु बनना चाहते थे, मां की सेवा के लिए वापस आए घर 
बालासोर में जन्में सारंगी ने फकीर मोहन कॉलेज से स्नातक किया। वे रामकृष्ण मठ का भिक्षु बनना चाहता थे। पश्चिम बंगाल के हावड़ा में बेलुड़ मठ में भी गए। वहां मठ के भिक्षुओं ने उनके बारे में पूछा। जब भिक्षुओं को पता चला कि सारंगी की मां विधवा हैं, उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है। तब उन्होंने सारंगी को वापस घर भेज दिया और कहा आप जाकर अपनी मां की देखभाल करिए। इसके बाद वो अपने गांव लौट आए और समाज सेवा में जुट गए। पिछले साल ही उनकी मां का निधन हो गया।
दो बार विधायक रह चुके हैं, अब बने सांसद
सारंगी पहली बार 2004 और दूसरी बार 2009 में नीलगिरी से विधायक बने। उन्होंने 2014 में भाजपा की तरफ से बालासोर से लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। भाजपा ने उनपर 2019 में भी भरोसा दिखाया और दोबारा टिकट दिया। इस बार उन्होंने बीजू जनता दल के उम्मीदवार और मौजूदा सांसद रवीन्द्र कुमार जेना को 12,956 वोटों के अंतर से हरा दिया।

बजरंग दल के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं
सारंगी को स्थानीय लोग ‘नाना’ के नाम से जानते हैं। यह बजरंग दल के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं। उन्होंने शादी नहीं की है। गाड़ी का इस्तेमाल नहीं करते हैं बल्कि साइकिल से ही चलने हैं। अस्सी के दशक में उन्होंने राज्य में कई जगहों पर एकल विद्यालय (स्थानीय शिक्षक के साथ गांव के स्कूल) शुरू किए थे। ये एकल-शिक्षक स्कूल कक्षा 3 से 5 तक के छात्रों के लिए होते हैं। गांव के युवा ही स्कूल में पढ़ाते हैं और गांव के लोग ही मिलकर शिक्षक का वेतन देते हैं।

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