रोजगार की खोज में भटकती अर्थव्यवस्था

रोजगार की खोज में भटकती अर्थव्यवस्था

 

 

पूरा शासनतंत्र यह स्वीकारने को तैयार ही नहीं है कि बढ़ती बेरोजगारी आज की सबसे बड़ी समस्या है। आतंकवाद व नक्सलवाद नहीं। महात्मा गांधी ने भारत की आजादी के संघर्ष में अपने प्रवेश की शुरूआत में ही कहा था कि रोजगार ही व्यक्ति को गरिमामय बना सकती है। आज जिस तेजी से सभी ओर और सभी क्षेत्रों में रोजगार घट रहे हैं, उसमें हैरान-परेशान युवा क्या करें? एमबीए और बीई करे लड़के-लड़कियां माल्स के काउंटर पर सामान बेचने का काम कर रहे हैं। पढ़े-लिखे लड़के क्या अब केवल कूरियर कंपनियों के लिए ग्राहकों तक माल पहुंचाने भर के लिए बचे हैं? इसी से उपजी हताशा ने शायद दलितों और अल्पसंख्यकों के प्रति असहिष्णुता में वृद्धि की है।

कंपनी सचिवों के संगठन की स्वर्ण जयंती पर आयोजित सम्मेलन में प्रधानमंत्री का अंतहीन भाषण सुना। भारत की आर्थिक प्रगति के जो आंकड़े उन्होंने महाभारत और गीता सहित तमाम धार्मिक उद्धरणों से समझाए, तो लगा कि यदि भाषण समाप्त हो जाए तो फिर टेलीविजन की आरती उतार कर भारतीय अर्थव्यवस्था को पुन: आसमानी बुलंदियों पर पहुंच जाने के उपलक्ष्य में सवा ग्यारह रुपये का प्रसाद बांटकर, देश भर में चल रहे आर्थिक विश्लेषण के यज्ञ का उद्यापन कर ही देना चाहिए।

आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि वस्त्र से लेकर सूचना तकनीक क्षेत्र में रोजगार नष्ट हो रहे हैं, परंतु अर्थव्यवस्था मजबूत से मजबूत होती जा रही है, जो जीएसटी और नोटबंदी से कुटीर, छोटे और मध्यम उद्योग बर्बादी के कगार पर पहुंच गए हैं मगर अर्थव्यवस्था दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रही है। महंगाई बढ़ती जा रही है, मुद्रास्फीति की दर में लगातार वृद्धि हो रही है, रिजर्व बैंक स्वयं घबड़ाकर ब्याज दर कम नहीं कर रहा है, भारतीय स्टेट बैंक का मानना है कि मंदी मात्र तकनीकी नहीं है, इससे निकट भविष्य में छुटकारे की उम्मीद नहीं रखना चाहिए। परंतु समीक्षा, आलोचना या निंदा करने वाले सिर्फ मजाक का पात्र हैं।  आदमी भले ही आज प्यास से मर रहा हो, पानी उसे 72 घंटे बाद ही दिया जाएगा।

रोजन्दारी पर या असंगठित क्षेत्र को छोड़ दीजिए यदि पिछले तीन वर्षों में 67 कपड़ा मिलें बंद होने से 17600 स्थायी कर्मचारी बेरोजगार हो गए हों, या किसी रणनीति के तहत लार्सन व ट्रूबो अपने 14000 कर्मचारियों को निकाल दे या एचडीएफसी अपने यहां के 3230 कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दे या टीसीएस इंफोसिस व टेक महेंद्रा करीब 4000 कर्मचारियों को पिंक स्लिप पकड़ा दे, दुनिया का भविष्य कहे जाने वाली वैकल्पिक ऊर्जा के क्षेत्र में काम कर रही सुजलान ने अपने 1500 कर्मचारियों को निकाल बाहर किया हो। भले ही सन् 2016 में 212 स्टार्टअप बंद हो गए हों और इस सूची में अंतहीन नाम और आंकड़े  जुड़ते जाएंगे, मगर इसमें अर्थव्यवस्था पर कोई नकारात्मक प्रभाव दिखाई नहीं दे रहा है। नवाब के राज में सब दूर अमन चैन है।

तो साहब शलय की महाभारत कालीन नैराश्य फैलाने वाली प्रवृत्ति यशवंत सिन्हाओं, अरुण शौरियो, चिदम्बरों से विस्तारित होती, सांख्यकीय संस्थानों, सरकारी व गैर सरकारी बैंकों, बाजार व अर्थव्यवस्था के विचारकों, उद्योगपतियों, व्यापारियों, किसानों, मजदूरों, विद्यार्थियों, युवाओं, महिलाओं, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों में कैसे पहुंचती जा रही है। यदि प्रधानमंत्री शल्य की बात करते हंै और उन्होंने हर हाल में महाभारत संपूर्णता में पढ़ी होगी तो उन्हें हस्तिनापुर में राज्याभिषेक के दौरान युधिष्ठिर  को जो ज्ञान नारद ने दिया है, उसका भी स्मरण तो होगा ही। भारतीय मनोरंजन जगत ने भले ही नारद को ‘नारायण नारायणÓ जपने का पर्याय बना दिया हो, लेकिन महाभारत में उनके वचन पढ़कर उनकी असीम दिव्यता की अनुभूति होती है। एक स्थान पर वे कहते हैं, ‘किसानों को प्रसन्न रखना चाहिए। भला आपके राज्य में जल से भरे तालाब तो बहुतायत से हैं न? कहीं आपने खेती को वर्षा के भरोसे तो नहीं छोड़ रखा है? किसान का बीज व भोजन कभी भी नष्ट नहीं होना चाहिए।

आवश्यकता होने पर थोड़ा सा ब्याज देकर उन्हें धन भी देना चाहिए। आपके राज्य में खेती, गोरक्षा और व्यापार संबंधी लेनदेन ईमानदारी से होते हैं न? धर्मानुकूल व्यापार से ही प्रजा सुखी होती है। इसके अलावा शरशय्या पर पड़े भीष्म भी युधिष्ठिर को राजधर्म व राजकाज समझाते हैं। क्या यह सब भी स्मरण रखने योग्य नहीं है? आज किसान के पास न तो भोजन है और न ही बीज। हर दिन दर्जनों किसान आत्महत्या कर रहे हैं, फसल बचाने की हड़बड़ी में जहरीली कीटनाशक दवाइयों से महाराष्ट्र में 18 किसान मारे गए। सैकड़ों अस्पताल में भर्ती हैं, कईयों की आंखें खराब हो गईं। भारत का व्यापार आज किनके हाथों में है, क्या यह बराबरी के सिद्धांत पर चल रहा है या कुछ लोग इसमें वरीयता प्राप्त कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री ने यह भी बताया कि अभी तो एक ही तिमाही में जीडीपी 5.7 प्रतिशत पर आई है। यूपीए के राज में ऐसा 8 बार हुआ था। यानी अभी उनकी बराबरी करने में सात तिमाही की देरी है। सीधी सी बात है अगले 21 महीने में जीडीपी की वृद्धि दर यदि घटकर 0.2 प्रतिशत तक भी आ जाती है, तो भी सवाल पूछने या चेताने का किसी को कोई अधिकार नहीं है। वजह एकदम साफ स्पष्ट है कि भारतीय लोकतंत्र का वर्तमान स्वरूप पूर्णत: व्यक्ति केंद्रित होता जा रहा है और धीरे सायास संसदीय लोकतंत्र के प्रति अरुचि पैदा करने की कोशिश की जा रही है। हर आपत्ति या असहमति का जवाब केवल तुलनात्मक प्रत्युत्तर के रूप में आता है। पूरा शासनतंत्र यह स्वीकारने को तैयार ही नहीं है कि बढ़ती बेरोजगारी आज की सबसे बड़ी समस्या है। आतंकवाद व नक्सलवाद नहीं।

महात्मा गांधी ने भारत की आजादी के संघर्ष में अपने प्रवेश की शुरूआत में ही कहा था कि रोजगार ही व्यक्ति को गरिमामय बना सकती है। आज जिस तेजी से सभी ओर और सभी क्षेत्रों में रोजगार घट रहे हैं, उसमें हैरान-परेशान युवा क्या करें? एमबीए और बीई करे लड़के-लड़कियां माल्स के काउंटर पर सामान बेचने का काम कर रहे हैं। पढ़े-लिखे लड़के क्या अब केवल कूरियर कंपनियों के लिए ग्राहकों तक माल पहुंचाने भर के लिए बचे हैं? इसी से उपजी हताशा ने शायद दलितों और अल्पसंख्यकों के प्रति असहिष्णुता में वृद्धि की है। पहली बार संभवत: किसी वित्तमंत्री ने देश को पूर्व वित्तमंत्री और बुजुर्ग नेता की इस बेदर्दी से खिल्ली उड़ाई है। प्रधानमंत्री भी यह नहीं मानते हंै कि समीक्षा करने वाले निराशा नहीं भविष्य के प्रति आगाह करते हैं। कबूतर का आंख बंद कर लेना उसकी सुरक्षा की गारंटी नहीं बल्कि उसका स्वचयनित संकट है।

सवाल जीडीपी की घट-बढ़ तक ही सीमित नहीं है। सवाल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को कई गुना बढ़ जाने का भी नहीं है। सवाल विदेशी मुद्रा भंडार के रिकार्ड स्तर पर पहुंच जाने का भी नहीं है और सवाल भारत के बिस्व (विश्व नहीं) गुरु न बन पाने का भी नहीं है। सवाल महज रोजगार के अवसरों के बढ़ाने का है। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश किन क्षेत्रों में आ रहा है? क्या इसका उपयोग जमे-जमाए भारतीय उद्योगों के अधिग्रहण के लिए हो रहा है? हर महीने और हर साल कंपनियां अपने यहां कर्मचारियों की कटौती कर रहीं हैं, दूसरी ओर सरकार श्रम कानूनों में ऐसे परिवर्तन का प्रस्ताव कर रही है जिससे कर्मचारियों को निकालना और उनका शोषण अधिक आसान हो जाए। इसीलिए बीच-बीच में प्रत्येक नागरिक को अनिवार्य न्यूनतम वेतन का पुछल्ला छोड़ दिया जाता है, जबकि  अभी हम वृद्धावस्था, विकलांगता, पेंशन जैसी योजनाएं जिनमें महीने का 300 से 1500 रुपये तक देना होता है, नहीं दे पा रहे हैं। कुपोषित, गर्भवती व स्तनपान कराने वाली महिलाओं के पोषण आहार के लिए मात्र 6 रुपए रोज का प्रावधान है। अब हमारे  तारणहार डाक से पोषण आहार भेजने या 180 रुपए प्रतिमाह सीधे बैंक में जमा करने की योजना बना रहे हैं। यदि देश में रोजगार की स्थिति अनुकूल हो जाए तो तमाम सारी सामाजिक सुरक्षा योजनाएं अपने आप ही निरस्त हो जाएंगी।

कोई भी नीति निर्माता फिर चाहे वह नीति आयोग हो या कोई शासकीय मंत्रालय किसी भी रोजगार आधारित योजना के बारे में सोचता तक नहीं। स्किल इंडिया के अंतर्गत प्रशिक्षित युवाओं में से 90 प्रतिशत अभी भी बेरोजगार हैं। पुस्तक श्रृंखला ‘ए पीपुल्स हिस्ट्री आफ इंडियाÓ के अंतर्गत अपनी पुस्तक शुरुआती ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था, सन् 1757 से 1857 में  इरफान हबीब अध्याय मुक्त व्यापार (सन् 1813-57) में उस समय के परिवर्तनों की बात करते हंै कि ‘कैसे भारत जैसे औद्योगिक देश को कृषि आधारित बनाया गया। शिल्पकार कैसे मजदूर बन गए, कैसे बढ़ते राजस्व कर की वजह से किसान मजदूरी करने लगे।

दलितों की स्थिति कमजोर होती गई। अधिकांश लोग भूखे रहने लगे और धीरे-धीरे भारतीय अर्थव्यवस्था पतन के कगार पर पहुंच गई। आजादी के बाद लोग गांव से शहर आए। शहरीकरण बढ़ा। उधर गांव में किसान कम होते चले गए लेकिन खेत मजदूरों की संख्या में असाधारण वृद्धि होती गई। यदि आज औद्योगिक रोजगार एवं सेवाक्षेत्र के रोजगार में कमी आएगी तो गांव की ओर उलट पलायन बढ़ेगा। इसकी शुरूआत हो गई है। यदि इसमें वृद्धि हुई या इसे समय रहते नहीं रोका गया तो गांवों को संभालना कमोबेश असंभव हो जाएगा। अर्थव्यवस्था अब 7 तिमाही तक और इंतजार की स्थिति में नहीं है। गालिब यूं ही नहीं लिख गए,
Source:Agency

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Social Media Auto Publish Powered By : XYZScripts.com