कुछ तो था महात्मा गांधी में, जिनके मौन आंदोलन की लाठी कोई नहीं थाम सका

महात्मा गांधी के विचार उनसे मिले संस्कारों की पूंजी से आज भी युवा पीढ़ी पोषित हो रही है। समाज की रगों में उनके विचारों की ऊर्जा बह रही है। जो हर परिवेश को पुष्पित पल्लवित कर रही है। गांधी से सभी वैचारिक संस्कार तो लिए लेकिन जब-जब आंदोलन की बात आई उनके जैसे शांतिपूर्ण विरोध की नजीर कोई नहीं पेशकर सका। उनके मौन आंदोलन की लाठी कोई नहीं थाम सका। दिल्ली भी महात्मा गांधी के खिलाफत…आत्मशुद्धि…असहयोग… सविनय जैसे कई आंदोलन व उपवास की गवाह बनी। उसमें शरीक हुई। भले आज के आंदोलनों में दिल्ली वैसे पेश न आए लेकिन उस वक्त गांधी जी के साथ चली। सबरंग के इस अंक में गांधी की राजनीतिक यात्रा में दिल्ली का क्या रहा स्थान इसी से रूबरू होंगे।

दिल्ली में 23 नवंबर, 1919 को आयोजित प्रथम अखिल भारतीय खिलाफत आंदोलन में मोहनदास करमचंद गांधी उपस्थित हुए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हिन्दू-मुसलमानों के पारस्परिक सहयोग से केवल खिलाफत ही पैदा न की जाए, अपितु अन्य शिकायतों को भी दूर किया जाए। उन्होंने इस सम्मेलन में पहली बार असहयोग आंदोलन की अपनी योजना और क्रियाविधि प्रस्तावित की। ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार करने, सरकार के सहयोग न करने और विदेशी लोगों को भारतीय लोगों की शिकायतों के प्रति प्रबुद्ध करने के लिए इंग्लैंड (और यदि आवश्यक हो तो अमेरिका) में प्रतिनिधि भेजने के प्रस्ताव पारित किए गए। यह उल्लेख दिलचस्प है कि पहले सत्याग्रह की योजना स्टीफन कॉलेज के प्रधानाचार्य सुशील रूद्र के दिल्ली स्थित भवन में गांधी जी के आवासकाल के दौरान बनाई गई। दिल्ली ‘खिलाफत’ आंदोलन का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। असहयोग आंदोलन के चलाने के कारण दिल्ली में हकीम अजमल खां को छोड़कर कांग्रेस के सभी प्रमुख नेता डॉक्टर अंसारी, शंकर लाल, आसफ अली, देशबंधु गुप्ता को जेल में डाल दिया गया।

21 दिन की आत्मशुद्धि

दिल्ली में 11 और 15 जुलाई के बीच हिन्दू और मुसलमानों में भयंकर संघर्ष हुआ, जिसके फलस्वरूप बहुत से व्यक्ति घायल हुए। सांप्रदायिक उन्माद के प्रति दुखी होकर गांधी ने 21 दिन का उपवास (18 सितंबर) ‘आत्मशुद्धि’ (उन्होंने इसे यही संज्ञा दी) के उद्देश्य से किया। सीएफ एन्ड्रयूज ने ‘यंग इंडियाट’ के अपने संपादकीय में उल्लेख किया है, दिल्ली में रिज के नीचे, शहर से काफी दूर दिलखुश भवन में महात्मा गांधी अपना उपवास रख रहे थे। गिरते हुए खंडहरों वाला स्वयं वह ऐतिहासिक रिज, जो अतीत की बहुत सी लड़ाइयों की कहानी सुनाता है। दोनों समुदायों के बीच सदभाव लाने के लिए महात्मा गांधी की अध्यक्षता में अखिल भारतीय पंचायतकी स्थापना की गई।

दोबारा असहयोग आंदोलन

1930 में असहयोग आंदोलन गांधी के नेतृत्व में दोबारा आरंभ हुआ। इस आंदोलन की शुरुआत औपचारिक रूप से गांधी ने 12 मार्च 1930 को डांडी की ओर कूच करके नमक का कानून तोडऩे की दृष्टि से की गई थी। 5 मई 1930 को गांधी के बंदी बनाए जाने की खबर सुनते ही दिल्ली में हड़ताल हो गई और सभी दुकानें बंद हो गईं। कश्मीरी गेट स्थित जिला मजिस्ट्रेट के दफ्तर तक एक जुलूस निकाला गया जहां लाल रंग के कपड़े पहने हुए महिला स्वयं सेविकाओं ने दीवानी और फौजदारी अदालत, खजाने तथा पुलिस कार्यालयों का घेराव किया। देवदास गांधी, लाला शंकर लाल, देशबंधु गुप्त तथा चमन लाल सहित बहुत से लोगों ने गिरफ्तारी दी।

…ताकि सविनय बना रहे

वर्ष 1931 में सविनय अवज्ञा आंदोलन पूरे जोरों पर था। यह निर्णायक समय था जब इस आंदोलन को राष्ट्रवादी बढ़ावा मिल रहा था। उसी समय अचानक दिल्ली शांति वार्ता का केंद्र बन गई थी। वायसराय लार्ड इर्विन तथा गांधी के बीच लंबी बातचीत चली तथा सरकार व कांग्रेस के बीच 5 मार्च 1931 को 15 दिन की लगातार बातचीत के बाद गांधी-इर्विन पैक्ट नामक एक समझौता हुआ। इसके कुछ दिन बाद जब 23 मार्च को लाहौर में भगत सिंह सहित उनके दो साथियों को फांसी लगाई गई तो न केवल दिल्ली, बल्कि सारा देश शोक में डूब गया। दिल्ली में पूर्ण रूप से हड़ताल रही। 18 अप्रैल को लार्ड इर्विन के दिल्ली से रवाना होते ही गांधी-इर्विन पैक्ट का उल्लंघन शीघ्र ही बढऩा शुरू हो गया। लार्ड इर्विन ने जिन बातों से सहमति प्रकट की थी उनको उसके बाद आने वाले नए वायसराय लार्ड विलिंगडन ने अस्वीकार कर दिया। गांधी और सरदार पटेल को 4 जनवरी 1932 को गिरफ्तार कर लिया गया।

दूसरे महायुद्ध के शुरू होने पर 15 सितंबर, 1939 को दिल्ली में कांग्रेस की कार्यकारिणी समिति की बैठक हुई। गांधी की सलाह पर कार्यकारिणी समिति ने अंग्रेजी सरकार से भारत को स्वतंत्र घोषित करने की प्रार्थना की। फ्रांस के पतन बाद जब 3 जुलाई 1940 कोक दिल्ली में दोबारा कार्यकारिणी समिति की बैठक हुई तब भी यह मांग रखी गई। भारत में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध गांधी के नेतृत्व में सांकेतिक विरोध के रूप में वैयक्तिक सत्याग्रह आरंभ किया गया। आंदोलन में एक स्थिति ऐसी भी आई थी जब गांधी ने अपेक्षा की, कि जो सत्याग्रही गिरफ्तार नहीं किए गए थे उन्हें युद्ध विरोधी प्रचार करते हुए दिल्ली की ओर पैदल प्रस्थान करना चाहिए। स्थिति खराब होती देख ब्रिटिश कैबिनेट के प्रस्तावों के साथ 23 मार्च 1942 को स्टेफोर्ड क्रिप्स दिल्ली आए। 27 मार्च को गांधी की उनसे बातचीत हुई और इस प्रकार समझौते की थोड़ी सी आशा दिखाई देते ही वे 4 अप्रैल को दिल्ली से वापस लौट गए। मौलाना आजाद की अध्यक्षता में दिल्ली में कार्यकारिणी समिति की एक बैठक हुई, जिसमें अंग्रेजों के प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया गया।

भारत का वायसराय बनने के बाद लार्ड माउंटबेटन (24 मार्च 1947) ने गांधी सहित सभी प्रमुख राजनीतिक नेताओं, जिसमें मुहम्मद अली जिन्ना भी शामिल थे, की कठिन भारतीय समस्या का हल खोजने के लिए दिल्ली बुलाया। 3 जून की योजना अनिच्छा से स्वीकार कर ली गई। माउंटबेटन ने एक प्रसारण में कहा कि जोर जबरदस्ती का विकल्प केवल बंटवारा है। स्वतंत्रता और विभाजन दोनों की घोषणा 15 अगस्त 1947 को एक साथ हुई। विभाजन के कारण हुए विस्थापन और दंगों की भीषणता से दिल्ली भी अछूती नहीं रही। ऐसे में गांधी 9 सितंबर 1947 को दिल्ली आए। कश्मीर में पाकिस्तान के हमले के बावजूद गांधी ने भारत सरकार को पाकिस्तान की बकाया राशि का भुगतान करने के लिए कहा। अन्तत: उन्होंने आमरण अनशन तब तक जारी रखने का निर्णय लिया जब तक दिल्ली में सांप्रदायिक तनाव समाप्त नहीं हो जाता। 13 जनवरी, 1948 को उन्होंने सामुदायिक सौहार्द की पुन: स्थापना के लिए अनशन, उनका 15 वां, प्रारंभ किया। 18 जनवरी को डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद के नेतृत्व में सौ नेता बिड़ला भवन गए, जहां गांधी ठहरे हुए थे तथा उन्हें राजधानी में सांप्रदायिक शांति स्थापित करने का वचन दिया। दो सप्ताह से भी कम समय में राजधानी में सामान्य अवस्था की दोबारा स्थापना हो गई। अत: अनशन समाप्त हो गया। परंतु केवल 12 दिन के पश्चात ही गांधी की हत्या हो गई। प्यारेलाल ने अपनी पुस्तक ‘महात्मा गांधी-अंतिम चरण’ में गांधी की शव यात्रा के बारे में लिखते हैं कि राजा जार्ज पंचम की प्रतिमा के आधार तक जनता आस पड़ोस के तालाबों को बड़ी मेहनत से पार करके पहुंची थी। जैसे ही जुलूस गुजरने लगा वे जुलूस का दृश्य भली प्रकार से देखने के लिए, पत्थर की छतरी को सहारा देने वाले खम्भों पर लटक गए, 150 फीट ऊंचे युद्ध स्मारक की चोटी पर बैठे हुए दिखाई दिए, बत्ती के अथवा टेलीफोन के खम्भों पर तथा रास्ते के दोनों ओर लगे हुए वृक्षों की शाखाओं पर बैठ गए। दूर से समस्त केंद्रीय मार्ग (सेंट्रल विस्टा) मानवता का लगभग निश्चल सा विशाल जनसमुद्र दिखाई पड़ता था।

महिलाओं की थी खास भागीदारी

दिल्ली में स्वतंत्रता संग्राम के चरित्र की विशेषता यह रही कि राजधानी की शहरी और ग्रामीण आबादी दोनों ने कंधे से कंधा मिलाकर आजादी की लड़ाई में भाग लिया। महरौली और नरेला में स्थित खादी आश्रमों, बवाना की चौपाल और बदरपुर में गांधी खैराती अस्पताल कुछ ऐसे केंद्र थे, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के संदेश को फैलाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दिल्ली में आजादी की लड़ाई में हिंदू-मुस्लिम एकजुटता एक और खास बात थी। भारतीय मुसलमानों के खिलाफत आंदोलन को गांधी के आह्वान के कारण हिंदुओं का पूरा समर्थन मिला। यह गांधी के नेतृत्व का ही करिश्मा था कि अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन में दिल्ली की महिलाओं की हिस्सेदारी उल्लेखनीय थी। सत्यवती, पार्वती देवी डिडवानिया, अरुणा आसफ अली, वेद कुमारी, बृज रानी, मेमो बाई दिल्ली की कुछ ऐसी प्रमुख महिलाएं थीं, जिन्होंने आगे बढ़कर आंदोलन में भाग लिया। इन महिलाओं ने व्यापक रूप से विदेशी वस्तुओं की बिक्री के खिलाफ आंदोलन में दुकानों की पिकेटिंग में भाग लिया। इस दौरान शिक्षक और छात्रों भी स्वतंत्रता संघर्ष में गांधी के प्रभाव से अछूते नहीं थे। सेंट स्टीफन कॉलेज के प्रोफेसर रूद्र सहित हिंदू कॉलेज के शिक्षक आजादी की लड़ाई में हरावल दस्ता थे। सेंट स्टीफन, रामजस, हिंदू, इंद्रप्रस्थ गल्र्स कॉलेज के छात्र-छात्राओं ने आंदोलन में पूरी सक्रियता से भाग लिया। उल्लेखनीय है कि गांधी में दिल्ली में अपना पहला सार्वजनिक भाषण सेंट स्टीफन कॉलेज के छात्रों के समक्ष ही दिया था। गांधी ने दिल्ली में स्वतंत्रता आंदोलन को बहुत महत्व दिया और वास्तव में वे व्यक्तिगत रूप से यहां उपस्थित होकर उसे गति देने के इच्छुक थे। यही कारण है कि उन्होंने स्थानीय नेताओं जैसे हकीम अजमल खान, बहिन सत्यवती, देशबंधु गुप्ता, आसफ अली और डॉ मुख्तार अहमद अंसारी को काफी प्रोत्साहित किया। इस अवधि में वे अधिकतर रूद्र (सेंट स्टीफन कॉलेज), मोहम्मद अली, डॉ अंसारी के निवास और बिड़ला हाउस में रहे और लगातार वायसराय हाउस आते-जाते रहे।