मस्तिष्क बुखार से 15 दिन में 67 बच्चों की मौत

बिहार में मस्तिष्क बुखार (एईएस) से शनिवार को भी 4 बच्चों की मौत हो गई। इस बीमारी से 15 दिन में 67 बच्चों की मौत हो चुकी है। वहीं, स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने एक चैनल से बातचीत में कहा- बच्चों की मौत के लिए न प्रशासन जिम्मेदार है और न ही सरकार। बच्चों की नियति ठीक नहीं थी। मौसम भी इसके लिए जिम्मेदार है। सरकार ने इलाज के लिए पूरे इंतजाम किए थे।

67 बच्चों की हो चुकी है मौत

एसकेएमसीएच और केजरीवाल अस्पताल में पिछले 15 दिनों में एईएस से ग्रसित 67 बच्चों की मौत हो चुकी है। एसकेएमसीएच में भर्ती 6 बच्चों की हालत गंभीर है। यहां अभी 80 बच्चों का इलाज चल रहा है। केजरीवाल अस्पताल में भी 6 बच्चों की स्थिति नाजुक है। यहां 25 बच्चों का इलाज चल रहा है। दोनों अस्पतालों में अब तक 288 बच्चे भर्ती हुए हैं।

40 डिग्री से अधिक तापमान होने पर बीमारी बढ़ती

एसकेएमसीएच के शिशु रोग विभागाध्यक्ष डॉ. गोपाल शंकर साहनी ने बताया कि शोध में यह बात सामने आई कि जब गर्मी 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक और नमी 70 से 80 प्रतिशत के बीच होती है तो इस बीमारी का कहर बढ़ जाता है। बीमारी में बच्चे को तेज बुखार के साथ झटके आते हैं। हाथ-पैर में ऐंठन होती है, वह देखते-देखते बेहोश हो जाता है।

लक्षण दिखते ही बिना देर किए इलाज करवाना जरूरी

स्वास्थ्य विभाग ने इस बीमारी को लेकर गाइड लाइन जारी की है। इसके अनुसार, रात को खाली पेट सोने वाले बच्चे इसका अधिक शिकार होते हैं। बच्चे को जल्द से जल्द हॉस्पिटल पहुंचाना जरूरी है। डॉक्टर के अनुसार, एईएस का लक्षण दिखे तो बच्चे को तुरंत हॉस्पिटल ले जाना चाहिए। लक्षण उभरने के दो घंटे के भीतर इलाज मिलने से बच्चे की जान बचने की संभावना अधिक होती है। इसे देखते हुए एईएस प्रभावित जिलों के पीडीएस दुकानों पर गाड़ियों का प्रबंध किया गया है, जिससे बीमार बच्चे को तेजी से हॉस्पिटल पहुंचाया जा सके।

1-15 साल के बच्चे होते हैं शिकार
इस बीमारी में मस्तिष्क में सूजन हो जाती है। यह उन जगहों पर पाई जाती है जहां लीची के बगान अधिक हैं। 1-15 साल के बच्चे इसके अधिक शिकार होते हैं। बीमारी का लक्षण तेज बुखार, शरीर में चमकी, दांत बैठना, शरीर में ऐंठन और सुस्त और बेहोश होना है। सुबह तीन बजे से इसके लक्षण दिखने लगते हैं। खून में शुगर की मात्रा एकाएक कम हो जाती है।

लीची से जुड़ी है बीमारी
स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी गाइडलाइन के मुताबिक, लीची के बीज और फल में ऐसा रसायन होता है जो ब्लड शुगर के स्तर को अचानक कम कर देता है। यह रसायन पूरे पके लीची के फल में कम मात्रा में होता है। अधिक मात्रा में लीची खाने बाले बच्चे इसका शिकार हो सकते हैं। लीची खाने के बाद बिना भरपेट भोजन किए रात में सोने वाले बच्चे बीमारी के अधिक शिकार होते हैं। गर्मी के दिनों में बिना खाना पानी की परवाह किए धूप में खेलने वाले बच्चे भी इसके शिकार होते हैं।

HAMARA METRO

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