सुन्नी वक्फ बोर्ड में 61 लाख रुपये के घोटाला में अधिकारी को लेकर सामने आई बड़ी बात

सुन्नी वक्फ बोर्ड में 61 लाख रुपये का घोटाला करने वाले तृतीय श्रेणी के कर्मचारी इस्लाम अहमद अब्बासी को उसके मातहतों ने नियमों को दरकिनार करते हुए न केवल गाजियाबाद का अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी बनाया बल्कि बाद में उसे सुन्नी वक्फ बोर्ड का सीईओ भी बना दिया।

गाजियाबाद में तैनाती से पहले इस्लाम अहमद अब्बासी समाज कल्याण विभाग लखनऊ में सहायक विकास अधिकारी के पद पर तैनात था। यह पद तृतीय श्रेणी कर्मचारी का होता है। शीर्ष स्तर पर साठगांठ के चलते उसे 2016 में सीधे गाजियाबाद का जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी बना दिया गया, जबकि नियमानुसार यह पद पीसीएस एलाइड को दिया जाता है।

जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी बनने के बाद इस्लाम अहमद अब्बास ने छात्रवृत्ति घोटाले का खेल शुरू किया। पूर्व में हुआ मैसेज वायरल तो हुई कार्रवाई इस्लाम अहमद अब्बासी को इसी साल जनवरी में वक्फ बोर्ड में सीईओ बना दिया गया। सीईओ बनाए जाने के बाद अधिकारियों के वॉट्सएप ग्रुप में इस कारनामे को लेकर मैसेज वायरल हुआ था।

यह मैसेज अन्य ग्रुपों पर भी गया और चर्चाओं में आया। इसके बाद फरवरी में अब्बासी को सीईओ पद से हटा दिया गया। इस मैसेज में अब्बासी द्वारा किए गए कई घोटालों का जिक्र किया गया था। इसके साथ ही मैसेज में एक्ट का जिक्र करते हुए लिखा गया था कि एक्ट के अनुसार सीईओ के पद पर डिप्टी सेक्रेट्री से नीचे रैंक का अधिकारी तैनात नहीं हो सकता लेकिन इस पद पर तृतीय श्रेणी कर्मचारी की तैनाती कर दी गई।

शासन स्तर से हुआ विरोध तो खुली पोल
सूत्रों के मुताबिक शासन स्तर पर कई अधिकारी इस्लाम अहमद अब्बासी के काबिल न होने के बावजूद यह पद दिए जाने के विरोध में आ गए और उसके काले चिट्ठे खोलने पकड़ने शुरू दिए। शासन स्तर पर हुई शिकायत के बाद मामले की जानकारी जिले के अधिकारियों को हुई तो घोटाला उजागर हुआ और जिलाधिकारी रितु माहेश्वरी ने एडीएम प्रशासन की अध्यक्षता में मामले में जांच समिति गठित की।

यह है मामला

सुन्नी वक्फ बोर्ड के पूर्व सीईओ इस्लाम अहमद वर्ष 2016 में गाजियाबाद में अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी के पद पर तैनात था। आरोप है कि 2016 में छात्रों को मिलने वाली धनराशि को अब्बासी डकार गया। गाजियाबाद में तैनाती के दौरान सात मई 2016 से 10 मई तक चार दिन के अंतराल में 61 लाख रुपये की धनराशि सीधे लोनी में संचालित चार मदरसों के खाते में भेज दी गई।

एडीएम प्रशासन और जांच अधिकारी जितेंद्र कुमार शर्मा ने बताया कि नियम के मुताबिक, धनराशि ट्रांसफर करने से पहले जिलाधिकारी से मंजूरी लेनी होती है लेकिन उन्होंने जिलाधिकारी से कोई सहमति नहीं ली। वहीं शासनादेश के मुताबिक छात्रवृत्ति की धनराशि स्कूलों व मदरसों को नहीं भेजी जाती यह सीधे छात्रों के खातों में भेजी जाती है। इस मामले में हुई जांच में घोर अनियमितता पाई गई है। पूरी प्रक्रिया विधि के खिलाफ हुई है। जांच में अभिलेखों को भी गायब किया जाना पाया गया है। जांच रिपोर्ट जल्दी ही शासन को भेजी जाएगी।

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