ईरान और अमेरिका में व्यापार को लेकर हुईं दोनों के बीच टकरार

ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने मध्यपूर्व में पैट्रियट मिसाइलों और युद्धपोतों की तैनाती कर दी है। अमेरिका ने ईरान पर चौतरफा प्रतिबंध भी लगा रखा है। दुनिया के किसी भी देश को वह ईरान से व्यापार नहीं करने दे रहा है। उसने ईरान के रिवोल्युशनरी गार्ड कोर (आइआरजीसी) को विदेशी आतंकी संगठन घोषित कर दिया है। वहीं ईरान ने कहा है कि अगर उसका तेल बेचने से रोका गया तो इसके गंभीर परिणाम होंगे।

ऐसे आई रिश्तों में खटास
अमेरिका पिछले साल ईरान समेत छह देशों के बीच हुई परमाणु संधि से बाहर हो गया था। राष्ट्रपति ट्रंप के इस समझौते को रद करने के पीछे ये वजह बताई जा रही थी कि वह साल 2015 में तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा के समय ईरान से हुई संधि से ख़ुश नहीं थे। यही नहीं, ट्रंप ने दुनिया के देशों को धमकी देते हुए कहा कि ईरान से जो देश व्यापार करेगा वह अमेरिका से कारोबारी संबंध नहीं रख पाएगा।

नतीजा यह हुआ कि ईरान पर अमेरिका और यूरोप में खुलकर मतभेद सामने आए। यूरोपीय यूनियन ने ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते को बचाने की कोशिश की लेकिन ट्रंप नहीं माने। अब अमेरिका वॉर्सोवा में मध्य-पूर्व पर एक सम्मेलन करा रहा है। वह चाहता है कि ईरान विरोधी गठजोड़ में इजरायल, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के साथ यूरोप भी एकमत से शामिल हो जाए। ईरान एक बार फिर से संकट में घिरा हुआ है। ट्रंप प्रशासन को उम्मीद है कि इस तरह से घेरकर वह ईरान सरकार को नया समझौता करने के लिए मजबूर कर लेंगे और इसके दायरे में सिर्फ ईरान का परमाणु कार्यक्रम ही नहीं बल्कि बैलेस्टिक मिसाइल कार्यक्रम भी होगा।

अमेरिका ने ईरान से कच्चे तेल के आयात के लिए भारत समेत आठ देशों को जो छूट दी थी वह 2 मई को खत्म हो गई। अब भारत ईरान से तेल नहीं खरीद सकेगा। ईरान से सबसे ज्यादा तेल खरीदने वालों में चीन के बाद भारत दूसरे नंबर पर है। विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों के रिश्तों के बीच कोई खास असर नहीं पड़ेगा। हालांकि अमेरिका के फैसले के बाद अगर कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आता है तो इसका असर पड़ेगा। सबसे पहले रुपये की कीमत गिरेगी।

गैरकानूनी है प्रतिबंध

ईरान ने अमेरिकी पाबंदियों को गैरकानूनी बताया है। उसका कहना है कि वह किसी भी हालत में झुकने वाला नहीं है। ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद जरीफ ने कहा है कि उनके पास अमेरिकी प्रतिबंधों का जवाब देने के लिए कई विकल्प हैं। जिसमें परमाणु अप्रसार संधि से अलग होना भी शामिल है।

ढलान पर आर्थिक विकास ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों से ईरान की अर्थव्यवस्था कई वर्षों तक बुरी तरह प्रभावित रही है। 2015 में राष्ट्रपति हसन रूहानी ने उन प्रतिबंधों को हटाने के बदले में ईरान की परमाणु गतिविधियों को सीमित करने के लिए अमेरिका और पांच अन्य देशों के साथ एक समझौते पर सहमति जताई थी। समझौता लागू होने के बाद ईरान की अर्थव्यवस्था वापस पटरी पर लौटी और जीडीपी 12.3 फीसद बढ़ी। लेकिन नए सिरे से अमेरिकी प्रतिबंधों ने जीडीपी विकास दर को गिरा दिया है।

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