आँखों की देख भाल में न करें लापरवाही : डा. अंजली नागर

आँखों की देख भाल में न करें लापरवाही : डा. अंजली नागर

नीरज पाण्डेय पूर्वी दिल्ली। आज जहां अधिकतर लोग आँखों की  विभिन्न तरह की बीमारियों से ग्रस्त हैं वहीं कुछ लोग घरेलू उपचार के चक्कर में अपनी आंखें गवां बैठते हैं।
इस संदर्भ में ई एस आई सी अस्पताल झिलमिल की वरिष्ठ नेत्र विशेषज्ञ डा. अंजलि नागर ने एक साक्षत्कार में बताया कि हमारे शरीर की समस्त ज्ञानेन्द्रियों में आंखें सबसे प्रमुख हैं।
यदि कोई समस्या उत्पन्न होती है तो घरेलू उपचार न करके नेत्र चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए।
उन्होंने बताया आज कल बच्चों में रिफरेक्टिव ऐरर मरीजों की संख्या अधिक है।
इस बीमारी में बच्चों को दूर का काम दिखाई देता है । और उन्हें चश्मा लग जाता है। बड़ों को आखों का लाल हो जाना ,आई फ्लू , काला मोतिया बिंदु, सफेद मोतिया बिंदु बीमारियां प्रचलन में हैं । पहले इन रोगियों की संख्या कम थी, परंतु अब इन बीमारी वाले मारीजों  की संख्या में काफी इजाफा हुआ है। इसका मुख्य कारण मधुमेह एवं रक्तचाप का अनियमित होना और बढ़ना है।

सफेद मोतिया:-

सफेद मोतिया बिंदु में हमारे आँख की पुतली पारदर्शी होती है जो रिफ्लेक्शन करके चित्र बनाती है उस पर उम्र के बढ़ने पर कुछ बदलाव आने से उसके ऊपर एक परत जमा होने लगती है जिससे पारदर्शिता समाप्त हो जाती है और कम दिखाई देने लगता है और पुतली से चित्र पार मही हो पाता जिसे हम सफेद मोतिया बिंदु कहते है।

काला मोतिया बिंदु

काला मोतिया आँख का प्रेशर बढ़ने से होता है। आखों का नार्मल नोबल वैल्यू प्रेशर 18-20 होता है। यदि इससे अधिक बढ़ता है तो आँखों के आस पास की नसें दबने लग जाती हैं और उनमें रक्त प्रवाह कम हो जाता है और वह सूखने लग जाती है। जिससे ब्रेन में लगी ऑप्टिव नर्व खराब होने लगती है ।
इसके उपचार के लिए सबसे पहले मरीज को आँख का प्रेशर कम करने की दवाइयाँ दी जाती हैं । जिससे ऑप्टिव नर्व का बचा हुआ हिस्सा सुरक्षित रह सके आदि । दवाइयों से प्रेशर काम नही होता है । आपरेशन किया जाता और
आँखों का प्रेशर काम किया जाता है।

नाखूना:-

नाखूना रोग में आँख के ऊपर वाली परत कमजोर हो जाती है और उस पर कोने में खून जैसे लाल परत जम जाती है। यह रोग प्रायः प्रदूषण, धोइल मिट्टी, धूप में अधिक काम करने के कारण से होता है।
इससे बचने के लिए धूप का चश्मा , प्रदूषण, धूल मिट्टी, धुआं आदि जगहों से बचना चाहिए और विटामिन ए तत्व वाले खाद्य पदार्थों का सेवन करना फल तथा अधिक विटामिन वाले पदार्थ खाना चाहिए। यदि किसी को नाखूना हो गया हो तो शल्य चिकित्सा द्वारा हटा दिया जाता है।

भेंगापन (तिरछा देखना)

तिरछा पन आमतौर पर बच्चों में पाया जाता है जब बच्चों की नजर कमजोर होती है और घर वाले उसे अनदेखा कर ध्यान नही देते हैं । उन्हें पता ही नही चल पाता है कि बच्चे की आँख कमजोर है ऐसी हालत में बच्चा तिरछा देखने लगता है।
यह रोग बड़ों में भी तब होता है जब किसी व्यक्ति को लकवा मार गया हो और उसका असर ब्रेन में हुआ हो जिस तरफ लकवे का असर होता है उस आँख से व्यक्ति तिरछा देखने लगता है।
इससे बचने के लिए बच्चों की आँख अवश्य जांच करानी चाहिए । यदि बच्चे को स्कूल में दिक्कत महसूस होती है तो चश्मा अवश्य लगवा देना चाहिए ताकि भविष्य में बच्चे को आँख की समस्या से बचाव हो सके। यही कारण है की सरकार द्वारा समय समय पर स्कूलों में नेत्र जांच शिविर का आयोजन किया जाता है ताकि बच्चों को नेत्र रोग से बचाया जा सके ।

आँखों का लाल होना, खुजली होना या पानी आने पर आँख को रगड़ें नही बल्कि स्वच्छ ताजे पाने से आँख को धो लें और चिकित्सक से परामर्श लेकर दवा लें घरेलू  उपचार न करें नहीँ तो आँख में जखम होने से अल्सर होने की संभावना बढ़ जाती है कई बार मरीज के आँख की रोशनी तक चली जाती है।
आँख की देख भाल करना बहुत आवश्यक है, प्रदूषण,धुआं , धूप आदि से निरंतए बचाव करना चाहिए ताकि आँख स्वास्थ्य रहे अन्यथा आंख की फीचर फिल्म खराब होने लगती है और आँख हमेशा के लिए कमजोर हो जाती है और चश्में का नंबर बहुत जल्दी बढ़ जाता है।जो रोगी करेटोफोरस नामक बीमारी से ग्रस्त हैं उनका नंबर जल्दी जल्दी बढ़ जाता है।

ई एस आई सी झिलमिल अस्पताल में इलाज के लिए आये मरीजों से बात करने पर उन्होंने  बताया कि  यहां के डाक्टर पूरी जांच के बाद आपरेशन के लिए कहते है तथा जहां तक संभव  हो  वह इसका  समाधान दवा से ही खोजते हैं। कुछ मरीजों का कहना था की प्राइवेट अस्पतालों में आपरेशन के नाम पर पैसा वसूलते हैं।
वहां उपस्थित कई लोगों से बात करने पर लोगों का यही कहना था कि यहां थोड़ा समय अवश्य लगता है किन्तु नेत्र विभाग ई एस आई सी झिलमिल अस्पताल की पूरी टीम का इलाज सराहनीय है साथ ही उन्होंने बताया कि यदि जरा भी संदेह होता है तो वरिष्ट नेत्र रोग विशेषज्ञ डा. अंजलि नागर मरीज की जांच स्वयं करती हैं।