दुर्गुण,दुर्विचारों का दहन ही लंका दहन है – राजेष्वरानंदजी

दुर्गुण,दुर्विचारों का दहन ही लंका दहन है – राजेष्वरानंदजी

 

भोपाल। अपने हदय के भीतर के दुर्गुण,दुर्विचारों का दहन ही लंका दहन है। स्वामीजी ने कथा प्रस्रंग का विस्तार करते हुए कहा कि हनुमानजी ने रावण की सोने की लंका को जला दिया। क्योंकि रावण दुर्गुणों के प्रभाव के कारण न केवल पत्नी मंदोदरी ,भाई विभीषण ,माल्यवंत जैसे वयोवृद्ध व्यक्ति की उचित सलाह नहीं मानता बल्कि हनुमानजी जैसे विन्रम रामभक्त के अनुरोध को भी अस्वीकार कर देता है। और स्वयं ही उनकी पूंछ में आग लगाने की व्यवस्था करके लंका दहन का कारण बनता है। बस इसीतरह हमारे हदय के दुर्गुण ही सद्विचार ,सद्वृत्तियों को रोकते है और हमारे विनाष का कारण बनते रहे है। इस विनाष को रोकने के लिये आवष्यक है कि हम भक्ति कीषरण में जाए तभी हमारे भीतर सुमति आ सकती है। और जैसा कि हनुमान चालीसा में वर्णन आया है कि श्री हनुमान कुमति निवार सुमति के संगी है। वे ही भक्तों की सहायता करते है। लंका में विभीषण के अकेले घर का बचना इस बात का प्रभाव बताता है। आपने कहा कि यद्यपि संसार मंे सुमति और कुमति सभी के हदय में है। लेकिन सत्संग से कुमति दूर होती है और सुमति आती है जो हमारे कल्याण का कारण बनती है। इस संदर्भ में आपने सुमति और कुमति के बीच के संवाद को हास्य विनोद के साथ प्रस्तुत करते कहा कि एक बार कुमति ने अपने पिता ब्रहााजी से कहा कि सभी लोग सुमति की बढाई करते है क्या आप मुझे नहीं चाहते । तब ब्रहााजी ने दोनो बहनो कुमति एवं सुमति से कहा कि तुम दोनों चल कर दिखाओ। प्रत्युत्तर चाहने पर ब्रहाजी ने कहा कि देखों मुझे तुम दोनों अच्छी लगती हो लेकिन सुमति आती हुई अच्छी लगी और कुमति तुम जाती हुई अच्छी लगी। स्वामीजी हास्य विनोद के माध्यम से गंभीर बात को सहज सरल रूप में प्रस्तुत कर देते है।
उक्त उद्गार तुलसी मानस प्रतिष्ठान के तत्वावधान में पंडित गोरेलाल षुक्ल स्मृति समारोह के अंतर्गत परमपूज्य स्वामी राजेष्वरानंदजी सरस्वती ने सप्त दिवसीय प्रवचन प्रसंग में हनुमत चरित पर व्यक्त किये।

कार्यक्रम के षुभारंभ में मुख्य अतिथि के रूप में माननीय कृपाषंकर तिवारी ने कहा कि हमारे जीवन की सफलता का मूल्यांकन यही है कि हमने भगवान राम के आदर्ष चरित्र को कितना आत्मसात किया है। रामत्व की प्राप्ति ही हमारा उद्धेष्य होना चाहिये। आपने इस अवसर पर चित्रकूट में राजापुर ग्राम में रखी हुई तुलसीदासजी की हस्तलिखित मूल कृति की चर्चा करते हुए कहा कि उसके दर्षन और स्पर्ष कर भगवान श्रीराम के दर्षन का प्रत्यक्ष अनुभव होता है अतः सभी को चित्रकूट जाकर मूल प्रति के दर्षन करना चाहिये।
समारोह का षुभारंभ में पंडित गोरेलाल षुक्ल एवं गोस्वामी तुलसीदासजी के चित्र पर पुष्पांजलि एवं दीप प्रज्जवलन किया गया। इस अवसर पर महाराजश्री के स्वागत करने वालों में माननीय श्री सीताषरणषर्मा,अध्यक्ष, विधानसभा ,पूर्व मुख्यमंत्री श्री बाबूलाल गौर,कृपाषंकर जी षर्मा,श्री ओमप्रकाष सिंह सिंहल,श्री एन.एल.खंडेलवाल,पी.डी.मिश्र,कमलेष जैमिनी,श्री जवाहर सिंह,श्री महेन्द्र निगम एवं श्री रमाकांत दुबे प्रमुख थे।
प्रवचन प्रतिदिन दिनांक 7 दिसंबर 2017 तक संध्या 6.30 बजे से रात्रि 9.00 बजे तक होगें।

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