द्रोणाचार्य अवॉर्ड से नवाजे जाने वाले क्रिकेट कोच संजय भारद्वाज कहते हैं कि जितना खेलेंगे उतना निकलेगा डर

हाल ही में द्रोणाचार्य अवॉर्ड (लाइफ टाइम) के लिए चुने गए क्रिकेट कोच संजय भारद्वाज का मानना है कि अगर हमें एक अच्छी टीम बनानी है, तो व्यक्तिवाद की भावना को खत्म करना होगा। एक खिलाड़ी जब मैदान पर उतरता है, तो उसे सिर्फ अपने लिए नहीं खेलना होता, बल्कि उसकी जिम्मेदारी होती है कि वह टीम को लक्ष्य तक पहुंचाए। मिलकर खेलने से ही सफलता मिलती है।

संजय भारद्वाज का ताल्लुक वैसे तो हरियाणा के रोहतक जिले से है, लेकिन दिल्ली क्रिकेट सर्किल में ये एक लोकप्रिय चेहरा हैं। 90 के दशक से ये खिलाड़ियों को परखने और उन्हें तराशने की बड़ी जिम्मेदारी संभालते आ रहे हैं। इनके गाइडेंस में ही क्रिकेटर गौतम गंभीर, अमित मिश्रा, नवदीप सैनी, मनजोत कालरा, जोगिंदर शर्मा, उन्मुक्त चंद जैसे खिलाड़ियों ने बड़ा मुकाम हासिल किया है।

ऐसे में जब इन्हें द्रोणाचार्य अवॉर्ड देने की घोषणा हुई, तो वे इसे अपनी मेहनत और शिष्यों (खिलाड़ियों) की दुआओं का परिणाम मानते हैं। कहते हैं कि जिस तरह से उनके शिष्य खिलाड़ियों ने वर्ल्ड कप (दो जूनियर और दो सीनियर वल्र्ड कप) जीता, उसका ही नतीजा है ये अवॉर्ड। मैं खुद को काफी सौभाग्यशाली समझता हूं। इस कारण अब मेरी जिम्मेदारी और ज्यादा बढ़ गई है।

माली की निभाते हैं भूमिका

संजय बताते हैं, मेरे पास छठी-सातवीं कक्षा से बच्चे आने शुरू हो जाते हैं। इसके बाद मैं एक माली की तरह काम करता हूं। जैसे पौधा लगाया, तो उसे अच्छे से अच्छे तरीके से सींचना होता है। खाद-पानी (ज्ञान) देना होता है। इसके बाद जब भी एक बच्चा अच्छा परफॉर्म करता है और आगे बढ़कर देश के लिए खेलता है, तो गर्व ही होता है।

खेलने से ही निकलेगा डर

आज देश में काफी क्रिकेट खेला जा रहा है। घरेलू टूर्नामेंट्स के अलावा आइपीएल है, अंतरराष्ट्रीय मैच होते हैं। क्या इससे खिलाड़ियों पर दबाव बढ़ रहा है, पूछने पर संजय कहते हैं, बिल्कुल नहीं। इससे फायदा ही मिल रहा। जैसे, स्कूलों में जितने अधिक यूनिट टेस्ट्स होते हैं,तो उससे मुख्य परीक्षा का डर स्टूडेंट्स के मन से निकल जाता है। वही बात क्रिकेट में लागू होती है। इसमें भी दिल्ली के खिलाड़ी शेष राज्यों से थोड़े आगे नजर आते हैं, क्योंकि वे बाकियों से अधिक मैच खेलते हैं। इसलिए उनके अंदर का सारा डर निकल जाता है। आप देखते भी होंगे कि ज्यादातर आक्रामक बल्लेबाज दिल्ली से ही होते हैं।

एक्टिविटी के रूप में खेलें क्रिकेट

संजय बताते हैं कि उन्होंने खुद काफी क्रिकेट खेला है। स्कूल में थे, तभी खेलना शुरू कर दिया था। पहले जूनियर, फिर सीनियर टीम और कॉलेज की टीम से खेला। ये मैचेज इतने प्रतिस्पर्धी होते थे कि हमारे अंदर एक विशेष पहचान बनाने ककी उम्मीद जाग गई। आसपास का माहौल भी क्रिकेट खेलने के अनुकूल रहा, तो कभी पीछे मुड़कर देखना नहीं हुआ। आज के पैरेंट्स से यही कहना चाहूंगा कि वे अपने बच्चों को पेशेवर क्रिकेट खेलने के लिए दबाव न डालें, बल्कि एक्टिविटी के रूप में उन्हें खेलने के लिए प्रोत्साहित करें।

शिष्यों पर है नाज

संजय एनएसए डिप्लोमा करने के बाद 1989 में दिल्ली आए थे। यहां उन्हें गौतम गंभीर और अमित मिश्रा को तराशने की जिम्मेदारी मिली, जो उन्होंने बखूबी निभायी। इसके बाद तो इनकी दिल्ली के क्रिकेट सर्किल में खासी पहचान बन गई। इन्होंने करीब 20 साल कॉन्ट्रैक्ट पर रहते हुए कोच की जिम्मेदारी निभायी। फिर एलबी शास्त्री नाम से अपना क्रिकेट क्लब शुरू कर दिया। कहते हैं, मैं सभी खिलाडिय़ों पर समान ध्यान देता हूं। उसमें से कुछ अपनी प्रतिभा से कमाल दिखा देते हैं। जैसे गौतम गंभीर, उन्मुक्त चंद, जोगिंदर शर्मा आदि। मुझे उन पर नाज है।